सेक्टर-9 स्कूल पहुंचकर भावुक हुईं एसबीआई चीफ

श्रीमती भट्टाचार्य बीएसपी ईएमएमएस सेक्टर-9 स्कूल में स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा का अनावरण करने पहुंची थीं। श्रीमती भट्टाचार्य ने इसी स्कूल से अपनी प्रायमरी की शिक्षा प्राप्त की थी। उनका दाखिला क्रमांक 119 था। श्रीमती भट्टाचार्य ने कहा कि उन्होंने इस क्लास के लिए एडमिशन टेस्ट दिया था। अंग्रेजी, हिन्दी की वर्णमाला और 1 से 100 तक की गिनती पर आधारित इस परीक्षा में वे 'झÓ पर अटक गई थीं। इसे लिखाना काफी मुश्किल होता है।भिलाई। भारतीय स्टेट बैंक की चेयरमैन अरुंधति भट्टाचार्य आज अपने प्रायमरी स्कूल पहुंचकर भावुक हो गईं। उन्होंने भिलाई में बीते अपने बचपन की डाक्यूमेंटरी देखकर कहा कि इसे तैयार करने में कितनी मेहनत लगी होगी इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता। यह भिलाई के लोगों का स्नेह है जो उन्होंने 60 साल पुरानी बातों को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया। श्रीमती भट्टाचार्य बीएसपी ईएमएमएस सेक्टर-9 स्कूल में स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा का अनावरण करने पहुंची थीं। श्रीमती भट्टाचार्य ने इसी स्कूल से अपनी प्रायमरी की शिक्षा प्राप्त की थी। उनका दाखिला क्रमांक 119 था। श्रीमती भट्टाचार्य ने कहा कि उन्होंने इस क्लास के लिए एडमिशन टेस्ट दिया था। अंग्रेजी, हिन्दी की वर्णमाला और 1 से 100 तक की गिनती पर आधारित इस परीक्षा में वे ‘झ’ पर अटक गई थीं। इसे लिखाना काफी मुश्किल होता है। उसे ठीक से लिखने की कोशिश में उन्होंने अपनी उत्तर पुस्तिका को ही फाड़ डाला था और फिर जोर जोर से रोने लगी थीं। टीचर्स ने उन्हीं बड़ी मुश्किल से चुप कराया था। उन्हें तो लगता है कि यदि आजका एडमिशन टेस्ट होता तो शायद वे उसमें पास ही नहीं हो पातीं।श्रीमती भट्टाचार्य बीएसपी ईएमएमएस सेक्टर-9 स्कूल में स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा का अनावरण करने पहुंची थीं। श्रीमती भट्टाचार्य ने इसी स्कूल से अपनी प्रायमरी की शिक्षा प्राप्त की थी। उनका दाखिला क्रमांक 119 था। श्रीमती भट्टाचार्य ने कहा कि उन्होंने इस क्लास के लिए एडमिशन टेस्ट दिया था। अंग्रेजी, हिन्दी की वर्णमाला और 1 से 100 तक की गिनती पर आधारित इस परीक्षा में वे 'झÓ पर अटक गई थीं। इसे लिखाना काफी मुश्किल होता है।पुराने दिनों को याद करते हुए श्रीमती भट्टाचार्य ने कहा कि 60 साल पहले के भिलाई में आज जैसा कुछ भी नहीं था। एक शहर बस रहा था, स्कूल और बाकी नागरिक सुविधाएं भी धीरे धीरे विकसित हो रही थीं। अंडा या दूध लेने के लिए रायपुर जाना पड़ता था। यहां अस्पताल भी नहीं थे। वे संघर्ष के दिन थे। पूरे भारत से यहां एकत्र हुए लोग आधुनिक भारत के औद्योगिक तीर्थ की नींव रख रहे थे। स्कूल में चपरासी से लेकर एमडी तक का बच्चा साथ साथ पढ़ता था और उनके बीच किसी प्रकार का भेदभाव या वैमनस्य नहीं था।
अपने टीचर्स को याद करते हुए उन्होंने कहा कि उन शिक्षकों ने कुछ ऐसे मूल्य दिए जो उसके बाद के जीवन में, कैरियर में बेहद उपयोगी साबित हुए। इनमें से तीन मूल्यों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि टीचर्स ने हमें सिखाया कि खूब मेहनत करो, अपने कार्य में सुधार करते चलो और काम को अपना श्रेष्ठतम दो। यदि आप ऐसा करते हैं तो कोई भी आपकी सफलता को नहीं रोक सकता।
श्रीमती भट्टाचार्य ने कहा कि 1967 में उनके पिता का तबादला भिलाई से बोकारो हो गया। इस बात को पूरे 50 साल हो गये। पर शहर ने उन्हें याद रखा। शहर के लोगों ने उन्हें रखा यह एक बहुत बड़ा तोहफा है। उनके स्कूल के दिनों की तस्वीरें, सेक्टर-10, सड़क 24, 4-ए का उनका क्वार्टर, उस समय की कुछ तस्वीरें जो स्वयं उनकी स्मृतियों में धुंधली पड़ गई थी, उसकी डाक्यूमेंटरी देखकर उनकी आंखें भर आई हैं। डाक्यूमेंटरी में स्कूल में बिताए गए दिन, स्कूल के वार्षिकोत्सव की तस्वीरें दिल को छू लेने वाली थीं।
सबकुछ बदला पर नहीं बदली एक बात
श्रीमती अरुंधती भट्टाचार्य ने कहा कि तब से अब तक सबकुछ बदल गया है। उस समय स्कूलों में गहरा नीला और सफेद रंग का ही परिधान होता था। उन दिनों वे जिस स्कूल में भी जातीं बच्चे इसी ड्रेस में दिखते। अब तरह तरह के रंग आ गए हैं। ईएमएमएस सेक्टर-9 के बच्चों का भी परिधान बदल गया है। सब कुछ बदल गया है, पर नहीं बदली है तो केवल एक बात – बच्चों के चेहरे पर आज भी वही चमक है जो तब हुआ करती थी। कुछ कर गुजरने की चमक, सपने देखने की लालसा। यही बच्चे कल के नागरिक हैं और हमें इन्हें सही परवरिश देनी है।
अंग्रेजी सीखने की सिम्पल तरीका
श्रीमती अरुंधती ने कहा कि प्रायमरी में दाखिले के बाद अंग्रेजी सीखने की बारी आई। पहली से चौथी कक्षा तक स्कूल में अंग्रेजी के अलावा कोई और भाषा बोलने पर पाबंदी थी। यहां तक कि बाथरूम जाने के लिए भी टीचर की इजाजत अंग्रेजी में लेनी पड़ती थी। यही वजह थी कि चौथी पास करते तक सभी साफ अंग्रेजी बोलने लगे थे। उन्होंने कहा कि इसके पीछे यह बुनियादी सोच है कि बच्चे बहुत जल्दी किसी भी भाषा को सीख लेते हैं।
बहुत बदल गया है भिलाई
उन्होंने बताया कि जब हम यहां आए थे तो चारों तरफ केवल मुरुम मिट्टी थी, जंगल झाडिय़ां थीं, किसी बात की सुविधा नहीं थी। पर लोग मेहनती थी। देश के अलग अलग प्रांतों से आए इन लोगों ने यहां एक सुन्दर कास्मोपॉलिटल कल्चर डेवलप किया। मिलजुल कर रहने और घुल मिल जाने की एक अनोखी मिसाल पेश की जिसकी आज भी देश में प्रशंसा होती है। आज भिलाई एक महानगर बनने की ओर अग्रसर है। रायपुर से भिलाई तक चारों तरफ इमारते हैं, सुन्दर चौड़ी सड़कें हैं, वह सबकुछ है जिसकी कल्पना एक विकसित शहर में की जा सकती है। जल्द ही यहां आईआईटी भी आने वाला है।
कैसे सुरक्षित रहें बेटियां
श्रीमती भट्टाचार्य ने कहा कि बेटियों की सुरक्षा का संबंध हमारे पालनपोषण से है। हमने कोएडुकेशन स्कूल में पढ़ाई की। सब एक साथ पढ़ते थे, खेलते कूदते थे, कौन लड़का है और कौन लड़की इसका कोई फर्क नहीं पड़ता था। एक साथ पढऩे-बढऩे से हमने एक दूसरे का सम्मान करना सीखा, एक दूसरे जरूरतें के प्रति संवेदनशील हुए। हम किसी पर बंदिश नहीं लगा सकते क्योंकि इसका मतलब उसके विकास को रोक देना होगा। कौन जानता है कि कौन कल कितनी सुन्दर चीज मानवता को दे जाएगा।
श्रीमती भट्टाचार्य ने इस अवसर पर स्कूल परिसर में स्वामी विवेकानंद की आदमकद प्रतिमा का अनावरण किया। इसे प्रसिद्ध मूर्तिकार अंकुश देवांगन ने बनाया है। इस अवसर पर भिलाई इस्पात संयंत्र के सीईओ एम रवि, प्रबंधक जनसम्पर्क विजय मैराल, अरुण टोप्नो, प्रशांत तिवारी, स्कूल की प्राचार्य अपर्णा बनर्जी, एसके तंबोली, विजय लक्ष्मी रेड्डी, सपना अवस्थी, वैशाली सूपे, श्रीमती जब्बाल, पीटीए के अध्यक्ष डॉ सलीम अकील, उपाध्यक्ष अजय चौधरी, श्रीमती शिल्पी महाजन, श्री जयंत, श्री चावड़ा, भारतीय स्टेट बैंक भोपाल के सीजीएम केटी अजीत सहित एसबीआई के अधिकारी, बीएसपी के अधिकारी एवं शाला परिवार के सदस्य उपस्थित थे।

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