देश विदेश की आर्ट गैलरियों में सजी हैं इंदिरा पुरकायस्थ घोष की शिल्पकारी

रायपुर। मेरे जीवन की प्रेरणा मेरी मां है। बचपन में मां जब घर की सजावट, भाई की पढ़ाई के लिए पेंटिंग तैयार किया करती थी तो उस समय उसे देखकर मैं सोचती थी, मुझसे ऐसी पेंटिंग कभी नहीं बन पाएगी। लेकिन मां हमेशा कहती थी, जब करेगी तभी सीखेगी। धीरे-धीरे पेंटिंग बनाना शुरू किया, फिर पेंटिंग के प्रति मेरी रूचि को देखते हुए पिता ने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में फाइन आर्ट की पढ़ाई करने के लिए भेज दिया। आज आलम यह है कि देश-विदेश की आटर्गैलरियों में मेरी बनाई मूर्ति शिल्प सजती हैं। यह बातें महाकौशल कला वीथिका में आयोजित मूर्तिशिल्प प्रदर्शन के दौरान इंदिरा पुरकायस्थ घोष ने कही।रायपुर। मेरे जीवन की प्रेरणा मेरी मां है। बचपन में मां जब घर की सजावट, भाई की पढ़ाई के लिए पेंटिंग तैयार किया करती थी तो उस समय उसे देखकर मैं सोचती थी, मुझसे ऐसी पेंटिंग कभी नहीं बन पाएगी। लेकिन मां हमेशा कहती थी, जब करेगी तभी सीखेगी। धीरे-धीरे पेंटिंग बनाना शुरू किया, फिर पेंटिंग के प्रति मेरी रूचि को देखते हुए पिता ने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में फाइन आर्ट की पढ़ाई करने के लिए भेज दिया। आज आलम यह है कि देश-विदेश की आटर्गैलरियों में मेरी बनाई मूर्ति शिल्प सजती हैं। यह बातें महाकौशल कला वीथिका में आयोजित मूर्तिशिल्प प्रदर्शन के दौरान इंदिरा पुरकायस्थ घोष ने कही। आज उन्होंने कई विषय पर पेंटिंग मूर्तिशिल्प तैयार किए हुए है। प्रदेश के कल्चर को लेकर अनेकों मूर्तिशिल्प, पत्थर, फाइवर, पीतल के तैयार किए हैं। उन्होंने बताया कि पिछले 26 वर्षों यह सिलसिला जारी है, जिसमें एक मूर्तिशिल्प को तैयार करने में 30-45 दिन लग जाते हैं। रविवार सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक प्रदेश की सुविख्यात अर्टिस्ट इंदिरा पुरकायसत घोष की 15 मूर्तिशिल्प प्रदर्शित की गई। ये मूर्तिशिल्प समाज की समस्या, लोगों के विचार, दुराचार, घटित घटनाओं जैसे आदि विषयों पर आधारित थे। इस दौरान काफी संख्या में लोग जुटे रहे। उन्होंने मूर्तिशिल्पों के माध्यम से लोंगों को रास्ता दिखाने का काम किया है। इंदिरा ने बताया वे परिस्थिति के अनुसार चल रही चीजों को मूर्तिशिल्प के माध्यम से संजोने की कोशिश हमेशा करती रहती हैं। उन्होंने आतंकवाद, हिंसा, मोटिवेशनल जैसे विषयों में कई सारे मूर्तिशिल्प तैयार किए हैं। उनकी बनाई मूर्तिशिल्प देश-विदेश की आटर्गैलरियों में भी लगे हैं। वहीं एसेम्बली आॅफ एंगल्स मूर्तिशिल्प के लिए इन्हें राष्ट्रपति के हाथों सम्मानित भी किया जाएगा।
महाकौशल कला वीथिका में लोगों के विचारों पर आधारित इनकी मूर्तिशिल्प दुनिया की सच्चाई का बयां करती दिखाई देतीं हैं। कढ़ाई में उबल रहे अंड्डे के माध्यम से उन्होंने यह बताने का प्रयास किया कि जब कोई मां-बाप बच्चे की इच्छा, उसकी क्षमता को पहचाने बिना अपने हिसाब से उसे ढालना चाहते हैं, उस वक्त बच्चे का हाल उबलते अंड्डे की तरह होता है। जो किसी और की इच्छा को पूरा करने के लिए अपना अस्तित्व खो देता है। आंनदवाद पर बने मूर्तिशिल्प में उन्होंने आतंकवादी की भावनाओं को व्यक्त किया है। वहीं प्रीडेशन पर आधारित मूर्तिशिल्प के माध्यम से दुनिया की उस भावना का कटाक्ष किया है।

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