मैनपाट में कुदरत का करिश्मा, रबर की तरह उछालती है धरती

Mainpat bouncing land

रायपुर। मैनपाट को छत्तीसगढ़ का शिमला कहा जाता है। एक ऐसी जगह, जहां पूरी जमीन स्पंज के समान है। आप अगर इस पर थोड़ा भी उछलें तो यह आपको दो से तीन फीट तक उछाल देती है। जगह का नाम है जलजली। यह स्थान पर्यटकों के लिए आकर्षण और मनोरंजन का केंद्र बन चुका है। वैज्ञानिक यहां की भूमि संरचना व गुरुत्वाकर्षण पर शोध भी कर रहे हैं। बहुत बड़े क्षेत्रफल में फैला यह इलाका बिना भूकंप के हिलता हुआ सा प्रतीत होता है। यहीं पर बहती है जलजली नदी, जिसके नाम पर ही यह इलाका जाना जाता है। इस इलाके में पैर रखते ही जमीन धंसती जाती है और रबर की तरह वापस ऊपर की तरफ उठ भी जाती है। लोग इसपर उछलते हैं तो आसपास का बड़ा एरिया स्पंज की तरह हिलता है।
कुदरत के इस अनोखे खेल को देखने हजारों सैलानी यहां हर वर्ष पहुंचते है। पर्यटन विभाग की तरफ से यहां एक सूचना बोर्ड भी लगाया गया है। लोगों के लिए यह स्थान आज भी रहस्य ही है। स्थानीय लोगों के मुताबिक कभी यहां जलोत रहा होगा। वह समय के साथ ऊपर से तो सूख गया मगर अंदर की जमीन दलदली रह गई। हालांकि ऐसा होता तो पूरा इलाका स्पंज के समान होता जबकि ऐसा नहीं है। कई सौ वर्ग मीटर के क्षेत्रफल में स्पंज के समान यह भूमि कई दर्जन टुकड़ों में बंटी है। बीच-बीच में ठोस जमीन भी मौजूद है।
मैनपाट का नाम आते ही जेहन में खूबसूरत वादियों की तस्वीर उभर जाती है। यहां आलू की खेती से समृद्ध पठार, करीब सात माह तक शिमला जैसा मौसम, तिब्बतियों का बसेरा, हिलती हुई जमीन, मानसून के समय जमीन से लगभग सटकर उमड़ते घुमड़ते बादल, इस पूरे इलाके को खास आकर्षण का केंद्र बना देते हैं। सदिर्यों में यहां पूरे इलाके में बर्फ की महीन चादर सी बिछ जाती है।
पर्यटन विभाग के सुंदर सैला रिसॉर्ट से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर जलजली नदी दिखाई देती है। नदी का किनारा हरी घास की परत से ढंका है। पर्यटन स्थल मैनपाट अंबिकापुर नगर, सरगुजा और विश्रामपुर के नाम से भी जाना जाता है। यह अंबिकापुर से 75 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। झुलसा देने वाली गर्मी के बीच यह राज्य का सबसे ठंडा स्थान भी है।
10 मार्च 1959 को तिब्बत पर चीन के कब्जे के बाद भारत के जिन पांच इलाकों में तिब्बती शरणाथिर्यों ने अपना घर-परिवार बसाया, मैनपाट उनमें से एक है। यहां अलग-अलग कैंपों में रहने वाले तिब्बती टाऊ, मा और आलू की खेती करते हैं। यहां के मठ-मंदिर, लोग, खान-पान, संस्कृति सब कुछ तिब्बती संस्कृति से ओत-प्रोत हैं इसीलिए इसे मिनी तिब्बत के नाम से भी जाना जाता है।
होशंगाबाद में भी बना था ऐसा क्षेत्र
सन 1997 में जबलपुर में भूकंप आने के बाद होशंगाबाद स्थित नर्मदा के क्षेत्र में भी ऐसे दलदली क्षेत्र का निर्माण हुआ था लेकिन उसकी सटीक वजह क्या है, उसका पता लगाया जाना चाहिए। एक सिद्धांत यह भी है कि पृथ्वी के आंतरिक दबाव और पोर स्पेस (खाली स्थान) में ठोस के बजाय द्रव्य भरा हुआ हो, इसीलिए यह जगह दलदली और स्पंजी लगती है।
– डॉ. निनाद बोधनकर, भू विज्ञानी

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