भारत आज युवाओं का देश, यह दौर लौट कर नहीं आएगा : आईपी मिश्रा

IP Mishra Shree Gangajali Shikshan Samitiभिलाई। श्रीगंगाजली शिक्षण समिति के अध्यक्ष आईपी मिश्रा ने कहा कि भारत आज युवाओं का देश है और यह दौर फिर लौट कर नहीं आने वाला। उन्होंने कहा कि 135 करोड़ भारतीयों में से 82 करोड़ युवा हैं। पर अब नारी दो बार प्रसव पीड़ा से नहीं गुजरना चाहती। हम दो हमारे दो के बाद अब हम दो-हमारा एक का दौर चल पड़ा है। इसका मतलब यह भी है कि अब बच्चे कम पैदा हो रहे हैं और आयु लंबी हो रही है। कुछ ही समय बाद बूढ़ों की संख्या बढ़ने लगेगी जबकि युवाओं और बच्चों की संख्या लगातार घट रही होगी। इसलिए भारत को जो भी उपलब्धियां प्राप्त करनी हैं, उसके लिए यही उपयुक्त समय है।श्री मिश्रा स्वामी श्री स्वरूपानंद महाविद्यालय में आयोजित छात्रसंघ शपथ ग्रहण समारोह को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा, आज चारों तरफ नारी सशक्तिकरण की बातें होती हैं पर उनका मानना है कि नारी अनादिकाल से सशक्त रही है। हां, अब उसकी भूमिका बदल रही है। स्वरूपानंद महाविद्यालय के 22 सदस्यीय छात्र संघ में 19 छात्राएं हैं। यह देखकर उन्हें अपार प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है।
उन्होंने कहा कि नेपोलियन बोनापार्ट की सेना का प्रत्येक सदस्य यह मानकर युद्ध करता था कि वह नेपोलियन का सैनिक है, इसलिए अपराजेय है। यही उनकी विजय का रहस्य था। इसी तरह के आत्मविश्वास के साथ श्रीशंकराचार्य समूह के बच्चे भी जीवन में आगे बढ़ें कि वे श्रीशंकराचार्य से हैं, इसलिए उनकी राह कोई रोक नहीं सकता। उन्होंने कहा कि समूह के महाविद्यालय आज प्रतिवर्ष 3000 से अधिक कुशल स्नातक पैदा कर रहे हैं। इनमें से कोई नासा में हैं तो सिलिकॉन वैली और बेंगलुरू जैसे शहर में उनकी कालोनियां बस गई हैं।
श्री मिश्रा ने कहा, ‘एक मां अपने बच्चे के लिए जितना करती है, कोई और नहीं कर सकता। वह अपने जीवन के तीन महत्वपूर्ण वर्ष अपनी संतान को सहर्ष दे देती है। इसके बाद भी जीवन पर्यंत वह अपनी संतान को सिर्फ देती ही है। ऐसी नारी शक्ति को वे प्रणाम करते हैं।’
माता-पिता को वृद्धाश्रम भेजने वालों को कड़ा संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि ऐसा सोचना भी पाप है। एक प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने कहा कि एक बार बूढ़े पिता के कानों में बेटा-बहू की बातें पड़ीं। बहू कह रही थी कि पिताजी को यहां अच्छा नहीं लगता। उनकी उम्र का कोई सदस्य परिवार में नहीं है। वे अकेलापन महसूस करते हैं और सारे दिन चिड़चिड़ाते रहते हैं। उन्हें वृद्धाश्रम छोड़ आते हैं जहां वे अपनी उम्र के लोगों के बीच रहेंगे। बेटा किसी तरह मन कड़ा कर पिता को यह प्रस्ताव सुनाने के लिए उनके पास आता है। पिता मुस्कुराते हुए कहते हैं, बेटा तुम लोगों को यहां असुविधा हो रही है। हमारे तौर तरीके तुम लोगों को रास नहीं आ रहे। बेहतर हो कि अब तुम अपना फ्लैट ले लो और वहां शिफ्ट हो जाओ। बेटा-बहू को काटो तो खून नहीं। वे भूल ही गए थे कि जिस घर को वे अपना समझ रहे थे वह पिता का ही था। दरअसल हमारा जीवन और हमारा करियर भी अपने माता पिता के बलिदानों से ही है। हमें इसका प्रतिपल ध्यान रखना चाहिए।

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