स्वरूपानंद में फैकल्टी डेवलपमेंट : अच्छा श्रोता होना ज्यादा जरूरी -प्रो. चौधरी

Faculty Development Programmeभिलाई। स्वामी श्री स्वरूपानंद सरस्वती महाविद्यालय में आयोजित फैकल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम के तृतीय दिन फिटनेस फॉर एकेडेमिशियन एण्ड स्ट्रेस मेनेजमेंट टेकनिक्स पर व्याख्यान प्रो. राजीव चौधरी, एसओएस, फिजिकल एजुकेशन विभाग, पं.रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय ने दिया। उन्होंने संप्रेषण कौशल की व्यवहारिक उपयोगिता पर भी प्रकाश डाला। सम्प्रेषण कौशल से संबंधित महत्वपूर्ण बिंदु को बताते हुए उन्होंने कहा कि सही तरीके से हम 15 मिनट तक ही अच्छे से सुन सकते हैं। हम संप्रेषित तथ्यों को कान एवं आंख के द्वारा ग्रहण करते है। संप्रेषन में श्रोता, संप्रेषण का माध्यम एवं ग्रहणकर्ता होते है। जब संप्रेषण दोनों ओर से हो तो बेहतर कम्यूनिकेशन कहलाता है। Swaroopanand Saraswati Mahavidyalayaसम्प्रेशण कौशल मुख्यत: रीडिंग, राइटिंग, हियरिंग और टॉकिंग से होती है। सुनना अधिक महत्वपूर्ण कौशल होता है। अच्छे स्पीकर की अपेक्षा अच्छा श्रोता होना चाहिए। विधाता ने इसलिए हमें दो कान एवं एक मुख दिया है। इसलिए हमें अच्छी बातों का मूल्यांकन कर अच्छा श्रोता बनना होगा। संप्रेषण में मनोवैज्ञानिक बाधायें होती है जैसे – 1. आवाज में मॉड्लेशन होना आवश्यक है, साथ ही उसकी तीव्रता पर नियंत्रण होना चाहिए 2. संप्रेषण के दौरान बाधित करने वाली क्रियाये न हो 3. टेक्सचर सही हो, फेस एवं बॉडी लेग्वेज सही होना चाहिए 4. आई कान्टैक्ट बहुत महत्वपूर्ण होता है। सम्प्रेषण में प्रत्येक विद्यार्थी को यह लगना चाहिए कि शिक्षक उसे देखकर पढ़ा रहा है। अच्छा कौशल तभी होगा जब कम्यूनिकेशन में बाधायें न हों तथा कम्यूनिकेशन श्रोता और वक्ता दोनों की तरफ से हो।
अभिव्यक्ति एवं प्रत्याशित परिणाम पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि दोनों में तालमेल एवं सामजस्य आवश्यक है। दूसरों की कमी को इगनोर करें तभी सम्प्रेषण कौशल अच्छा होगा।
दूसरे सत्र में कार्य स्थल पर योगा के द्वारा कैसे स्ट्रैस मुक्त रहा जा सकता है इस विषय पर प्रकाश डाला गया। प्राणायाम एक ऐसा साधन जिसके द्वारा हम रेजूविनेशन को कम कर सकते है। प्राणायाम सांसो की क्रिया को लेना, रोकना एवं छोड़ना एवं मन को एकाग्रकर ध्यान लगाना है।
डब्लू.एच.ओ के अनुसार शारीरिक, मानसिक, सामाजिक सभी तरह से स्वस्थ्य होना चाहिए। हमारे सुश्रुत एवं चरक संहिता के अनुसार हमारी तीन नाड़िया महत्वपूर्ण है चंद्रनाडी़- शीतलता को दर्शाती है यह उत्सर्जन तंत्र को नियंत्रित कर स्वस्थ बनाती है। पिंगला नाड़ी हमारे रक्त संचार एवं श्वसन तंत्र को संचालित करती है दोनों में समन्वय रहे तभी स्वस्थ रहेंगे। सुषुम्ना नाड़ी, इडानाड़ी एवं पिंगला नाड़ी के बीच समन्वय करती है, सुषुम्ना नाड़ी कुण्डली एवं चक्र के माध्यम से इनके बीच समन्वय करती हैे। उन्होंने शरीर के समस्त कुण्डली एवं चक्रों की स्थिति एवं उसकी विशेषताओं को का वर्णन किया है।
प्राणायाम की सहायता से हम शरीर की थकान को दूर कर सकते है। जालन्धर बंध के बिना प्राणायाम नहीं किया जा सकता है। जालन्धर बंध की फिजियोलॉजी में उन्होंने बताया कि लेफ्टसाइनस नस एवं राइट साइनस नस, दिमाग को ब्लड पहुंचाते है। एक्टिविटी द्वारा प्रयोग में बताया गया कि यदि दोनों नसों को दबाया जाय तो आप दूसरी दुनिया का अनुभव करते है।
ऊर्जावान बनने के लिए प्राणायाम के उज्जयी एवं अनुलोम विलोम करना बेहतर बताया। धूल से एलर्जी होने पर नेति प्राणायाम कर हम एलर्जी से मुक्ती पा सकते है, सुबह के समय में किया गया प्राणायाम स्वास्थ्य लाभ देता है जिसे जीवन में अपनाकर हम स्वस्थ एवं निरोगी रह सकते है।
दोनों सत्र में मंच संचालन श्रीमती श्वेता दवे, सहा-प्राध्यापक बॉयोटेक्नोलॉजी ने किया। कार्यशाला में शा. महाविद्यालय खुर्सीपार की प्राचार्य डॉ. रीना मजूमदार एवं शा. महाविद्यालय उतई, शा. महाविद्यालय वैशाली नगर, शा.व्ही.वाई.टी. स्नातकोत्तर महाविद्यालय दुर्ग, देव संस्कृति महाविद्यालय, प्रिज्म महाविद्यालय, एम.जे.महाविद्यालय, कल्याण महाविद्यालय, षा.महाविद्यालय बोरी, सांई महाविद्यालय भिलाई से प्राध्यापकगण उपस्थित हुये।

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