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स्वरूपानंद महाविद्यालय में संत साहित्य पर राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी का उद्घाटन

National Seminar at SSSSMVभिलाई। स्वामी श्री स्वरूपांनद सरस्वती महाविद्यालय एवं भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद् के संयुक्त तत्वावधान में भारतीय दर्शन का संत साहित्य पर प्रभाव विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी का उद्घाटन हेमचंद यादव विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ. अरुणा पल्टा के मुख्य आतिथ्य में संपन्न हुआ। अध्यक्षता महाविद्यालय के सीओओ डॉ. दीपक शर्मा ने की। विशेष अतिथि के रुप में प्राचार्य डॉ. हंसा शुक्ला, आचार्य डॉ. महेशचंद्र शर्मा, डॉ. संदीप अवस्थी शोध निदेशक, भगवंत विश्वविद्यालय, अजमेर (राजस्थान), डॉ. शोभा निगम, पूर्व विभागाध्यक्ष दर्शनशास्त्र, छत्तीसगढ़ महाविद्यालय उपस्थित हुई।Deepak-Sharma-SSSSMV National Seminar at SSSSMV Bhilaiडॉ. दीपक शर्मा ने कहा, ईश्वर ने अनेक रचनायें की है उसमें सर्वश्रेष्ठ रचना मानव है। परमात्मा ने मानव को परमात्मा का पुत्र कहलाने का हकदार बनाया है। उसे बुद्धि व शक्ति दी, भक्ति की भावना दी, पर मानव शक्ति पाकर अहंकारी हो गया और भूल गया कि मनुष्य बनकर हमें मनुष्यता की रक्षा कैसे करनी है। हम दूसरे के दुख को दूर करते हैं, दूसरे की पीड़ा को समझते हैं, तभी हम आत्मा की सेवा करते हुये परमात्मा को प्राप्त कर सकते है। मनुष्य में देवत्व का जो अंश खो गया है उसे हम संतों के बताये गये मार्ग पर चल कर पुन: प्राप्त कर सकते है।
प्राचार्य डॉ. हंसा शुक्ला ने कहा भारतीय दर्शन का संत साहित्य पर स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। संतों ने यही कहा कि भगवा वस्त्र पहनने से कोई संत नहीं हो सकता। हमारा धर्म कर्म प्रधान है व आत्मा को परमात्मा का अंश माना गया है और अगर हम यह स्वीकार कर ले हर आत्मा में परमात्मा का अंश है तो हम किसी को भी तकलीफ नहीं पहुंचा सकते है।
कुलपति डॉ. अरुणा पल्टा ने कहा कि भारत विविधताओं का देश है। यहां सभी जाति व संप्रदाय के लोग रहते हैं व अनेक संतों व गुरु परंपराओं को मानने वाले हैं। संतों की जाति या व्यवसाय नहीं देखा जाता। कबीर-जुलाहा, रैदास मोची थे। पर लोगों ने इन्हें संत के रूप में स्वीकार किया। वे उच्च श्रेणी के संत कहलाये। सभी संतों की वाणी का मुख्य निष्कर्ष यही निकलता है कि स्वार्थ की भावना से ऊपर उठकर मानव समाज की सेवा करने वाला ही संत कहलाता है। उन्होंने कहा मेरे दृश्टिकोण में डॉ. अब्दुल कलाम भी संत है क्योंकि उन्होंने अपने लिये नहीं अपितु देश के लिये अपना जीवन समर्पित कर दिया।
बीज वक्तव्य में डॉ. शोभा निगम ने कहा कि सर्वप्रथम भक्ति का उल्लेख वेदों में दिखाई देता है पर मुक्ति का चित्रण कर्मकाण्डों में दिखाई देता है जिसमें यज्ञों द्वारा मुक्ति की कामना की गई। पर जब यज्ञ बहुत खर्चीला होने लगा व उसमें पशुबलि का प्रयोग किया जाने लगा तब त्रुटियों को दूर करने के लिये बौद्ध व जैन धर्म का प्रादुर्भाव हुआ। डॉ. निगम ने दक्षिण भारत से आलवार संतों द्वारा भक्ति धारा प्रवाहित होने की बात कही। अनेक संतों ने विभिन्न संप्रदायों की स्थापना की व साहित्य रचना द्वारा अपने सिद्धांतों का प्रचार व प्रसार किया।
प्रथम सत्र के मुख्य वक्ता डॉ. संदीप अवस्थी शोध निदेशक, भगवंत विश्वविद्यालय, अजमेर ने बताया कि भारत का दर्शन कपिल के सांख्य दर्शन से प्रारंभ होता है जिन्होंने सतो, रजो व तमो गुणों की चर्चा की व उन्हें संयमित व निर्देशित करने का उपाय बताया। वेदांत में मनुष्य में उस परब्रम्हा का अंश स्वीकार किया है व बताया मनुष्य माया के वशीभूत हो अपना मूल अस्तित्व भूल गया है।
मुख्य वक्ता आचार्य डॉ. महेशचंद्र शर्मा ने भारतीय दर्शन का संत साहित्य पर प्रभाव विषय पर अपने वक्तव्य में कहा कवि, मनीषी और ऋषि ईश्वरत्व को भी प्राप्त हो जाते हैं। राम कथाकार भगवान शिव और गीताकार भगवान श्री कृष्ण भी कवि है। वस्तुत: कवि संत और ऋषि भी प्राय: एक ही है। चिन्तन मनन और आत्मदर्शन के पश्चात काव्य सर्जना वस्तुत: दार्शनिक पृष्टभूमि पर ही होती है इसलिये कवि और दार्शनिक में कोई विशेष अंतर नहीं है।
एम.जे. स्वशासी महाविद्यालय, जलगांव के दर्शनशास्त्र की अध्यक्ष डॉ. रजनी सिन्हा ने सत्र के अध्यक्षीय उद्बोधन में पढ़े गये शोध पत्रों की समीक्षा की व शोध पत्र की विशेषताओं व त्रुटियों को अवगत कराया। उन्होंने बताया कि दर्शन शास्त्र समस्त विषयों की जननी है। उन्होंने अस्तिक, नास्तिक व संत किसे कहते हैं पर विचार व्यक्त किया। इस सत्र में डॉ. अभिनव जैन – भारतीय दर्षन का संत साहित्य पर प्रभाव – आचार्य विद्यासागर श्री महाराज द्वारा रचित महाकाव्य मूक माटी के परिप्रेक्ष्य में, डॉ. राजेश श्रीवास्तव ने तुलसी के अयोध्या काण्ड दृष्टिगत जीवन मूल्य ने अपने अनुसंधान मूलक शोध पत्र पढ़े।
द्वितीय सत्र में श्रीमती हेमलता सिरदार ने संत कबीर दास जी के काव्य का साहित्य व समाज पर प्रभाव, डॉ. श्रीमती मोहना सुशांत पण्डित ने भारतीय दर्शन एवं महिला समानता पर अपना शोध पत्र पढ़ा।
शोध संगोष्ठी में देशभर से लगभग सौ से अधिक प्राध्यापक व शोधार्थी सम्मिलित हुये। मंच संचालन डॉ. नीलम गांधी विभागाध्यक्ष वाणिज्य, डॉ. शमा अ. बैग विभागाध्यक्ष माईक्रोबायोलॉजी ने किया व शिक्षा विभाग की अध्यक्ष डॉ.पूनम निकुम्भ ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

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