वेब संगोष्ठी परसाई के व्यंग्य आज भी प्रासंगिक – डॉ रमेश तिवारी

Parsai Jayanti at Science College Durgदुर्ग। शासकीय विश्वनाथ यादव तामस्कर स्नातकोत्तर स्वशासी महाविद्यालय के हिन्दी विभाग तथा आईक्यूएसी के संयुक्त तत्वावधान में परसाई जी की जयंती पर हिन्दी व्यंग्य परंपरा और हरिशंकर परसाई विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय वेब संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का उद्घाटन महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ आरएन सिंह ने किया। Science college department of hindiप्राचार्य डॉ सिंह ने कहा कि परसाई जी ने न केवल अपने विपुल लेखन से हिन्दी साहित्य को समृध्द किया बल्कि एक बहुत बड़ा पाठक वर्ग भी तैयार किया। उन्होंने उस दौर का संस्मरण सुनाया जब परसाई जी सागर विश्वविद्यालय में मुक्तिबोध शोधपीठ के अध्यक्ष थे। परसाई जी उच्चशिक्षा प्राप्त विद्यार्थियों के भविष्य को लेकर चिंतित थे। परसाई जी ने कहा था कि कल कारखानों में बनने वाले उत्पाद की खपत कहां होगी यह तय होता है, लेकिन हमारे विश्वविद्यालयों से निकलने वाले छात्र कहा जायेंगे यह तय नही है।

अतिथि वक्ता व्यंग्यकार एवं आलोचक डॉ रमेश तिवारी (दिल्ली) ने परसाई जी के विभिन्न कहानियों, निबंधों आदि का उदाहरण देकर उनकी रचनाओं में छिपे व्यंग्य को उद्घाटित किया। उन्होंने कहा- परसाई जी ने व्यंग्य को विगलित हास्य तथा भावुकता से मुक्त कराया। उसे व्यापक सामाजिक सरोकारों से जोड़ा। और समाज में जहां भी विसंगतियां देखी उस पर करारा प्रहार किया। उन्होंने चिंता जाहिर करते हुए कहा कि परसाई जी के समय जो परिस्थितियां थी आज की परिस्थितियां उससे ज्यादा विषम है, इसीलिए परसाई जी का व्यंग्य आज ज्यादा प्रासंगिक है।

छत्तीसगढ़ के सुप्रसिध्द व्यंग्यकार विनोद साव ने हिन्दी व्यंग्य लेखन की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि कबीर हिन्दी के पहले व्यंग्यकार थे। कबीर की परंपरा भारतेन्दु और निराला से चलकर परसाई तक आती है और परसाई तक आते-आते व्यंग्य की धार ज्यादा महीन व तेज हो जाती है। परसाई की व्यंग्य रचनाओं में शोषक वर्ग पर प्रहार तथा शोषित, पीड़ित वर्ग के प्रति गहरी करूणा है।

संगोष्ठी के अंतिम अतिथि वक्ता व्यंग्यकार तथा समीक्षक कैलाश मंडलेकर (खंडवा) ने कहा कि परसाई जी ने आजादी के बाद के भारत में राजनीति तथा प्रशासन में भ्रष्ट्राचार, भाई भतीजावाद, धार्मिक सामाजिक रूढ़ियों तथा साम्प्रदायिक शक्तियों पर जमकर प्रहार किया। उनके लिखे हुए को समझने के लिए आलोचकों को एक नये सौंदर्यशास्त्र की आवश्यकता है। उन्होंने आगे कहा कि परसाई जी की रचनाओं को बौध्दिक पाठक से लेकर साधारण पाठक भी पढ़ते थे। यहां तक कि जिन्हें वे लक्ष्य कर लिखते थे, वे भी उन्हें चाव से पढ़ते थे। व्याख्यान के पश्चात् संगोष्ठी में सम्मिलित प्रतिभागियों के प्रश्नों/जिज्ञासाओं का समाधान अतिथि वक्ताओं ने किया। संगोष्ठी में देषभर से लगभग 900 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।

संगोष्ठी के आरंभ में अतिथियों का स्वागत तथा विषय प्रवर्तन विभाग के अध्यक्ष एवं संयोजक डॉ अभिनेष सुराना ने किया। आमंत्रित अतिथि वक्ताओं डॉ रमेश तिवारी, कैलाश मंडलेकर तथा विनोद साव का स्वागत क्रमशः डॉ बलजीत कौर, डॉ कृष्णा चटर्जी एवं प्रो. थानसिंह वर्मा ने किया। कार्यक्रम में विभाग के प्राध्यापक डॉ शंकर निषाद, डॉ जय प्रकाश साव, डॉ रजनीश उमरे के अलावा तकनीकी सहयोग के लिए प्रो. दिलीप साहू, डॉ अभिषेक मिश्रा, प्रो. जनेन्द्र कुमार दीवान एवं ढालसिंह साहू उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन प्रो. थानसिंह वर्मा ने तथा आभार प्रदर्शन डॉ शंकर निषाद ने किया।

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