हाइटेक हॉस्पिटल में रेटिना डिटैचमेंट सर्जरी की सुविधा, नवजातों के लिए आरओपी स्क्रीनिंग भी

Retina Surgery and RoP can bringdown figures of blindnessभिलाई। हाइटेक सुपरस्पेशालिटी हॉस्पिटल में आंखों से जुड़ी जटिलतम सर्जरी की सुविधा उपलब्ध हो गई है। अब यहां रेटिनल डिटैचमेंट सर्जरी, रेटिनल लेज़र, विट्रेक्टॉमी एवं आरओपी स्क्रीनिंग की सुविधा उपलब्ध करा दी गई है। इससे नवजातों की आरओपी स्क्रीनिंग संभव हो गई है जिससे जन्मजात नेत्ररोगों तथा अन्धत्व की रोकथाम संभव होगी। हाइटेक इस सुविधा को जिले में उपलब्ध कराने वाला पहला अस्पताल बन गया है।हाइटेक के नेत्र विशेषज्ञ डॉ सुयश नोएल ने बताया कि नेत्र रोगों को लेकर भारत में जागरूकता की कमी है। इसकी वजह से लोग नेत्र रोगों के साथ एडजस्ट करते रहते हैं। नवजात बच्चों, विशेषकर प्रीमेच्योर बच्चों की आंखों की रोशनी को लेकर लोग संवेदनशील नहीं है। शासन ने इसके लिए नवजातों की आरओपी स्क्रीनिंग को अनिवार्य किया है। यदि समस्या का तत्काल पता लगाया जाए तो उसका इलाज कर बच्चे के भविष्य को सुरक्षित किया जा सकता है। देर हो जाने पर विकृति स्थायी हो जाती है जिसे दूर नहीं किया जा सकता।
उन्होंने बताया कि आंखों की ऊपरी परत की जांच तो हो जाती है पर रेटिना (आंख का पर्दा) की जांच आम तौर पर नहीं की जाती। रेटिना संबंधी विकारों के कारण दृष्टि बाधित हो सकती है जिसका इलाज संभव है। रेटिना डिटैचमेन्ट सर्जरी, रेटिनल लेज़र, विट्रेक्टॉमी, एंटी वीजीएएफ इंजेक्शन आदि की सुविधा उपलब्ध हो जाने से अब अधिकांश नेत्र रोगों का इलाज संभव हो गया है।
मधुमेह के मरीजों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि ऐसे मरीजों में जिन्हें पिछले 8-10 सालों से मधुमेह है, नजर की परेशानियां आम हो जाती हैं। नजर का धुंधलापन, फोकस करने में कठिनाई, रात को बहुत कम दिखना जैसी समस्याएं भी होती हैं। इससे क्वालिटी ऑफ लाइफ काफी कम हो जाती है। इन समस्याओं का बेहतर प्रबंधन कर नजर को सुरक्षित रखा जा सकता है।
क्या है आरओपी
रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमैच्योरिटी या आरओपी समय पूर्व प्रसाव के मामलों से जुड़ी एक समस्या है। इसमें बच्चे की आंखों की नसों का पूर्ण विकास होने से पहले ही उसका जन्म हो जाता है। जन्म के बाद ये नसें बेतरतीबी से बढ़ने लगती हैं। इसके कारण रेटिना पर जख्म हो सकते हैं। जख्मों के सूखने पर उनके खिंचाव उत्पन्न होता है और वे आंखों के पर्दे (रेटिना) को खींचकर हटा देते हैं। नवजातों की स्क्रीनिंग करने पर इस स्थिति का तत्काल पता लगाया जा सकता है। कुछ मामले जहां खुद-ब-खुद ठीक हो जाते हैं वहीं अन्य मामलों में नेत्र विशेषज्ञ की जरूरत पड़ती है। आरओपी सर्जरी से इन नसों की बेतरतीब वृद्धि को रोका जा सकता है। इसके लिए लेजर का उपयोग किया जाता है जो रेटिना की किनारियों पर काम करता है ताकि रेटिना के बीच का हिस्सा सुरक्षित रहे। इसके अलावा आंख में एक इंजेक्शन भी लगाया जाता है जो नसों के स्वस्थ विकास को सुनिश्चित करता है। रेटिनल डिटैचमेन्ट के एडवांस्ड मामलों में स्केरल बकलिंग नामक प्रोसीजर को अपनाया जाता है। इसमें एक सिलिकॉन बैंड को आंखों की किनारियों से भीतर सरकाया जाता है जो रेटिना को उखड़ने से बचाता है। इसके अलावा विट्रेक्टोमी की जा सकती है जो एक बेहद जटिल प्रक्रिया है। ये सभी सुविधाएं अब हाइटेक अस्पताल में उपलब्ध हो गई हैं।

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