कोविड अस्पताल में तोड़फोड़ गैरजमानती अपराध, 7 साल की कैद, दोगुना हर्जाना भी

Epidemic Disease Ammendment Ordinanceभिलाई/नई दिल्ली। यदि किसी व्यक्ति या लोगों द्वारा कोविड अस्पताल या वहां कार्यरत चिकित्सकों एवं अन्य कर्मचारियों के साथ हिंसक मारपीट करता है, उनके कामकाज में बाधा उत्पन्न करता है या काम की परिस्थितयों को प्रभावित करता है तो उसे 7 साल तक की कैद और 5 लाख रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। साथ ही उसे पीड़ित पक्ष को हर्जाना देना होगा जिसका निर्धारण अदालत करेगी। संपत्ति को पहुंचाई गई क्षति की भरपाई वस्तु के बाजार मूल्य से दोगुना की दर पर करना होगा। ये अपराध संज्ञेय और गैरजमानती हैं। Epidemic Disease Amendment Ordinance 2020ये प्रावधान महामारी रोग (संशोधन) अध्यादेश- 22 अप्रैल, 2020 में किये गये हैं ताकि जान जोखिम में डालकर कोविड महामारी के सामना कर रहे स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। इसमें जांच का अधिकार कम से कम इंस्पेक्टर रैंक के अधिकारी को प्रदान किया गया है।
अध्यादेश के अनुसार महामारी के दौरान स्वास्थ्य सेवा कर्मी के खिलाफ हिंसक कार्रवाई करना, संपत्ति को नुकसान पहुंचाना या ऐसा करने के लिए किसी को उकसाना अपराध की श्रेणी में शामिल है। ऐसा करने पर 3 माह से लेकर 5 साल तक की कैद या 50,000 रुपए से लेकर 2 लाख रुपए तक का जुर्माना किया जा सकता है। यदि कार्रवाई हिंसक होती है या गंभीर क्षति पहुंचाती है तो अपराधी को 6 माह से लेकर 7 साल तक की कैद और एक लाख से लेकर 5 लाख रुपए तक का जुर्माना भरना पड़ सकता है। यह अपराध संज्ञेय और गैर जमानती हैं।
अध्यादेश के अंतर्गत दोषी व्यक्तियों को उन स्वास्थ्य सेवा कर्मियों को अदालत द्वारा निर्धारित मुआवजा चुकाना होगा जिन्हें क्षति पहुंची है। संपत्ति के नुकसान या क्षति की स्थिति में पीड़ित को देय मुआवजा क्षतिग्रस्त संपत्ति के उचित बाजार मूल्य की दोगुना राशि होगा, जैसा कि अदालत द्वारा निर्धारित किया गया है। अगर दोषी व्यक्ति मुआवजा नहीं चुकाता तो यह राशि राजस्व वसूली एक्ट, 1890 के अंतर्गत भूराजस्व के बकाये के रूप में वसूली जाएगी।
स्वास्थ्य सेवा कर्मी को गंभीर क्षति पहुंचाने वाले व्यक्ति पर मुकदमे के दौरान अदालत यह मानकर चलेगी कि वह व्यक्ति दोषी है, जब तक कि वह व्यक्ति खुद को बेगुनाह साबित नहीं कर देता।
अध्यादेश महामारी रोग एक्ट, 1897 में संशोधन करता है, जिससे स्वास्थ्यकर्मियों को संरक्षण प्रदान किया जा सके। अध्यादेश स्वास्थ्य सेवा कर्मियों को ऐसे व्यक्तियों के रूप में परिभाषित करता है जिन पर अपने कर्तव्यों का पालन करने के दौरान महामारियों के संपर्क में आने का जोखिम है। इनमें डॉक्टर और नर्स तथा महामारी की रोकथाम में नियोजित सभी लोग शामिल हैं।
‘हिंसक कार्य’ में स्वास्थ्य सेवा कर्मियों के जीवन या काम की स्थितियों को प्रभावित करने वाला उत्पीड़न, क्षति पहुंचाना, कार्य में बाधा उत्पन्न करना, या उनकी संपत्ति या दस्तावेजों को नुकसान पहुंचाना शामिल है। संपत्ति में क्लिनिकल एस्टैबलिशमेंट, क्वारंटाइन केंद्र, मोबाइल मेडिकल यूनिट, और ऐसी अन्य संपत्तियां शामिल हैं जो स्वास्थ्य सेवा कर्मी का महामारी से प्रत्यक्ष जुड़ा हो।
अध्यादेश के अंतर्गत पंजीकृत मामलों की जांच FIR दर्ज होने की तारीख के 30 दिनों के भीतर इंस्पेक्टर या उससे उच्च रैंक वाले पुलिस अधिकारी को पूरी करनी होगी। इंक्वायरी या ट्रायल एक वर्ष के भीतर समाप्त होना चाहिए। ऐसा नहीं हो सका तो न्यायाधीश को समय सीमा बढ़ाने के लिए विलंब का कारण रिकार्ड करना होगा। हालांकि समय सीमा सिर्फ छह महीने तक बढ़ाई जा सकती है।

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