वीर्य में न हो एक भी शुक्राणु तब भी पितृत्व का सुख मिलना संभव : डॉ रेखा रत्नानी

No sperm in semen, ICSI can helpभिलाई। आपाधापी का जीवन, तनाव और बढ़ी उम्र में विवाह के कारण आज संतान सुख एक बड़ी चुनौती बन गई है। अकसर पुरुषों में शुक्राणुओं का कम होना, कमजोर होना या बिल्कुल भी नहीं होना इसका एक बड़ा कारण है। पर यदि वृषण में शुक्राणु मिल जाएं तो भी ऐसे पुरुष पितृत्व का सुख प्राप्त कर सकते हैं। यह कहना है बांझपन विशेषज्ञ डॉ रेखा रत्नानी का। उन्होंने ऐसे दर्जनों दंपतियों को संतान सुख प्रदान किया है जो विवाह के सालों बाद भी गर्भधारण नहीं कर पा रहे थे। (देखें वीडियो) हाइटेक सुपरस्पेशालिटी हॉस्पिटल की स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ रेखा रत्नानी एक फर्टिलिटी विशेषज्ञ हैं। उन्होंने बोस्टन (यूएस) से आइवीएफ और इक्सी का प्रशिक्षण लिया। वे बताती हैं कि हाइटेक हॉस्पिटल के सुसज्जित अत्याधुनिक लैब के कारण ऐसे अनेक लोगों को स्व-संतान का सुख प्राप्त हुआ है जो अनेक जगहों पर इलाज कराकर थक चुके थे। इनमें ऐसी महिलाएं भी शामिल हैं जो गर्भाशय या डिंब ग्रंथियों के विकारों से ग्रस्त थीं। ऐसे पुरुष भी हैं जिनके वीर्य में शुक्राणु बिल्कुल नहीं थे।
डॉ रत्नानी ने बताया कि महिलाओं में गर्भधारण की सही उम्र 23 से 30 के बीच होती है। ऐसी महिलाएं यदि साल भर में सामान्य तरीके से गर्भधारण नहीं कर पातीं तो उन्हें आइवीएफ सेन्टर की मदद लेनी चाहिए। पर यदि महिला की उम्र 35 वर्ष से अधिक है और वह छह माह में गर्भधारण नहीं कर पाती है तो उसे तत्काल आईवीएफ स्पेशलिस्ट की मदद लेनी चाहिए। इसमें जितनी देर की जाएगी, मामला उतना ही कठिन होता जाएगा।
उन्होंने कहा कि आईवीएफ/इक्सी स्पेशलिस्ट के पास हमेशा जोड़े से जाना चाहिए। वहां मां, ननद या सास का कोई काम नहीं होता। दंपति एक साथ उपस्थित हों तो पहले ही विजिट में दोनों की जांच की प्रक्रिया पूरी कर समस्या का पता लगाया जा सकता है। इसके साथ ही इलाज का स्वरूप भी निर्धारित किया जा सकता है।
उन्होंने बताया कि महिला बांझपन में गर्भाशय में रसौली (ट्यूमर), गर्भाशय की दीवारों का पतला होना, फैलोपियन ट्यूब्स का बंद होना, अंडाशय में पर्याप्त स्वस्थ अंडों का न होना, अंडाशय में रसौली होना आदि कई कारण हो सकते हैं। वहीं पुरुषों के वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या कम होना, उनका कमजोर होना या बिल्कुल न होना जैसे कारण हो सकते हैं। इन सभी स्थितियों में इलाज की अलग अलग तकनीकों का प्रयोग किया जाता है जिसकी पूरी सुविधा हाइटेक सुपरस्पेशालिटी हॉस्पिटल में मौजूद है।
गर्भाशय में रसौली होने पर उसे सर्जरी द्वारा हटा दिया जाता है। इसके तुरन्त बाद गर्भधारण की कोशिश करनी चाहिए। फैलोपियन ट्यूब्स बंद होने पर डिम्बग्रंथियों से अंडा प्राप्त कर लैब में निषेचन की क्रिया की जाती है। इसके बाद भ्रूण को गर्भाशय में स्थापित कर दिया जाता है। इस प्रक्रिया को आईवीएफ कहा जाता है।
डॉ रत्नानी ने बताया कि शुक्राणु के कमजोर होने या उनकी संख्या बहुत कम होने पर विशेष यंत्रों द्वारा सबसे स्वस्थ शुक्राणु को चुन कर उसे इक्सी पद्धति द्वारा डिम्ब में प्रविष्ट करा दिया जाता है। इसके बाद लैब में ही भ्रूण को विकसित किया जाता है और बाद में उसे गर्भाशय में स्थापित कर दिया जाता है। वीर्य में शुक्राणु बिल्कुल न हो तो सीधे वृषण से शुक्राणु प्राप्त किया जाता है। ऐसे शुक्राणु चूंकि तैर नहीं सकते इसलिए इक्सी प्रक्रिया से उन्हें सीधे डिम्ब में प्रविष्ट कराकर निषेचन की प्रक्रिया को पूरा किया जाता है।
सही उम्र में कराएं डिम्बों व शुक्राणुओं को सुरक्षित
डॉ रत्नानी ने बताया कि यदि किसी कारणवश सही उम्र में विवाह नहीं हो पा रहा है या संतान पैदा करने की स्थित नहीं है तो हमें अण्डों और शुक्राणुओं को फ्रीज करा देना चाहिए। हाइटेक सुपरस्पेशालिटी हॉस्पिटल में अण्डों एवं शुक्राणुओं को फ्रीज (cryopreservation) करने की सुविधा उपलब्ध है। सही उम्र (25-29) में अण्डों की संख्या काफी होती है और उनकी गुणवत्ता भी अच्छी होती है। इसी उम्र में डिम्बों को प्राप्त कर उन्हें फ्रीज करा देना चाहिए। ये काफी समय तक सुरक्षित रहते हैं। एक ऐसे मामले का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि एक हादसे में एक मां ने अपना एकमात्र जवान बेटा खो दिया। पर उनके अण्डे सुरक्षित थे। हमने आईवीएफ तकनीक अपनाकर उन्हें 50 की उम्र के बाद भी संतान सुख देने में सफल रहे।

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