मातृभाषा दिवस : भाषा थोपने की लड़ाई ने कर दिये थे पाकिस्तान के दो टुकड़े

Language dominance caused splitting of Pakistanदुर्ग। शासकीय विश्वनाथ यादव तामस्कर स्वशासी महाविद्यालय दुर्ग में 20 फरवरी को हिन्दी विभाग द्वारा विश्व मातृभाषा दिवस का आयोजन किया गया। अध्यक्षता प्राचार्य डॉ आरएन सिंह ने की। विशेष अतिथि के रूप में बंगला भाषा के कवि समरेन्द्र विश्वास तथा मलयालम भाषा के कथाकार चन्द्रशेखरन पिल्लई उपस्थित थे। डॉ अभिनेष सुराना ने विश्व मातृ भाषा दिवस मनाये जाने के इतिहास की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि किस तरह भाषा थोपने की जिद ने पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिये थे।उन्होंने बताया कि 21 फरवरी 1948 में पाकिस्तान द्वारा उर्दू को राष्ट्रभाषा घोषित किया गया, बंगला भाषी पूर्वी पाकिस्तान की जनता ने इसका विरोध किया और 21 फरवरी 1952 में ढाका विश्वविद्यालय के विद्यार्थियो ने बंगला भाषा को भी राष्ट्र भाषा का दर्जा दिये जाने की मांग की। इसे कुचलने के लिए पाकिस्तान की सेना ने हिंसा का सहारा लिया, जिसमें पांच विद्यार्थी मारे गये। उन विद्यार्थियों को बंगला भाषी जनता ने शहीद का दर्जा देते हुए उनकी याद में 21 फरवरी को मातृभाषा दिवस मनाना शुरू किया। 1998 में बंगला देश की सरकार ने संयुक्त राष्ट्र संघ से यह अपील की कि 21 फरवरी को विश्व मातृ भाषा दिवस घोषित किया जाये। संयुक्त राष्ट्र संघ ने इसे स्वीकार करते हुए यह दिवस संम्पूर्ण विश्व में मनाये जाने की घोषणा की । तब से 21 फरवरी को विश्व मातृभाषा दिवस मनाया जा रहा है।
कार्यक्रम का संचालन करते हुए डॉ जय प्रकाश साव ने इस आयोजन के महत्व को विस्तार से बताया। उन्होंने कहा वैश्विकरण हमारी बहुभाषिकता तथा बहुसंस्कृतिकता का अतिक्रमण कर रही है। यह संक्रमण बायोलॉजिकल ही नही, सांस्कृतिक भी है। आज जीव जगत का ही नही, बल्कि समूचे मानव का अस्तिव दांव पर लगा हुआ है, इसलिए इस संकट को गंभीरता से देखने की आवश्यकता है। उन्होने कहा बहुभाषिता पूरी दुनिया की पूंजी है। इसलिए हमें अपनी भाषा के साथ दूसरी भाषाओं का उतना ही सम्मान करना चाहिए।
अतिथि रचनाकार चन्द्रशेखरन ने मलयालम में अपनी मार्मिक कहानी ‘‘आसमान मेरा हमसफर’’ का तथा बंगला भाषा के कवि समरेन्द्र विश्वास ने ‘वर्णमाला एक स्कूली बालक का’ शीर्षक कविता का पाठ किया। महाविद्यालय के प्राध्यापकों में डॉ प्रज्ञा कुलकर्णी (मराठी), डॉ मर्सी जार्ज (मलयाली), डॉ ज्योति धारकर (मराठी), डॉ जगजीत कौर (पंजाबी), डॉ शंकर निषाद (भोजपुरी), प्रो. जनैन्द्र दीवान (संस्कृत), तथा विद्यार्थियों में जितेन्द्र कुमार (छत्तीसगढ़ी), आरती कुशवाहा (भोजपुरी), प्रवीण प्रधान (हिन्दी), संतोषी प्रधान (उड़ीया), देवराज एवं सोनम ने हिन्दी में काव्य पाठ किया।
अन्त में प्राचार्य डॉ आर.एन. सिंह ने अध्यक्षीय उद्बोधन किया। उन्होने एक अच्छे आयोजन के लिए हिन्दी विभाग को बधाई दिया। उन्होने कहां माँ की भाषा संतति को प्राप्त होती है। मातृभाषा से संस्कृति की अभिव्यक्ति संभव है। देश लम्बे समय तक गुलाम रहा, अंग्रेजो ने अंग्रेजी भाषा द्वारा हमारी संस्कृतिक विरासत को खत्म करने की कोशिश की हमारी चिन्तन प्रकिया को मंद कर दिया, इसी का परिणाम है कि बहुत से लोग अंग्रेजी में बात करने में अपना सम्मान समझते है और देशी भाषा बोलने वालो को हीन दृष्टि से देखते है। हमें इस गुलाम मानसिकता से मुक्त होना होगा और अपने मूल्यों एवं सांस्कृतिक विरासत को बचाये रखने के लिए अपनी मातृभाषा के साथ भाषायी बहुलता व सांस्कृतिक बहुलता को बचाऐ रखना होगा। कार्यक्रम में डॉ बलजीत कौर, डॉ थानसिंह वर्मा, डॉ एस.एन. झा, डॉ मीना मान, डॉ मीता चक्रवर्ती के अलावा बड़ी संख्या में छात्र/छात्राएं उपस्थित थे। कार्यक्रम अमित मिश्रा को स्वस्ति वाचन के साथ समाप्त हुआ। कार्यक्रम का संचालन डॉ जयप्रकाश साव ने तथा आभार प्रदर्शन डॉ शंकर निषाद ने किया।

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