गुस्ताखी माफ : हमने अंग्रेजों को एकजुटता से भगाया -भागवत
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि ब्रिटिश स्वेच्छा से भारत से नहीं गए, हमने उन्हें एकजुटता से भगाया। अपनी एकता और अखंडता के कुछ सूत्रों को हम भूल गए, इसलिए दृष्टि में भेद आ गया था। अंग्रेजों को हमारी एकता अच्छी नहीं लगी, इसलिए भेद पैदा किया। भारत में आकर भी कुछ लोग भारत की रीति में नहीं रहते हैं, इसलिए वह आक्रमण करते हैं। हम चिंतित हैं लेकिन हमें और चिंतित होना चाहिए। हम सब एक दूसरे को पकड़कर चलें। भागवत जी नेक कहते हैं पर लगता है अब बहुत देर हो चुकी है। भागवत जी को घर-घर में होने वाली बहसों को सुनना चाहिए। प्रवचन पंडालों में जाकर भी बैठना चाहिए। सहकर्मियों के बीच बढ़ते वैमनस्य को भांपना चाहिए। यहां तक कि सेना के एक अधिकारी कह चुके हैं कि जाति-धर्म का भेद सेना के मनोबल को कम कर सकता है। इससे ज्यादा कोई क्या ही कहेगा भला? लोगों का कुतर्क है कि संख्या बल तय करता है कि सच क्या है। हम इसे नहीं मानते। जब पाइथागोरस ने कहा कि पृथ्वी गोल है तो लोग हंसे। फिर जब अरस्तु ने सिद्ध कर दिया कि धरती गोल है तब भी लोग मानने को तैयार नहीं थे। उन्हें लगता था कि जहाज समन्दर में दूर तक जाएगा तो नीचे गिर जाएगा। आज भी लोग मानते हैं कि ईश्वर और स्वर्ग ऊपर है जबिक धरती के गोल होने को लेकर कोई शंका नहीं है। आप जिधर होते हैं आपका आकाश भी उधर होता है। अर्थात हर तरफ आकाश है। प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने आस्थागत स्वभाव के अनुरूप ही प्रतिक्रिया देता है। आज मुट्ठी भर लोग चिंतित हैं कि देश के भीतर भरे जा रहे जहर के कारण लोकजीवन संकट में है। विभाजन की रेखाएं और गहरी होती जा रही हैं। अंग्रेज भी यही तो चाहते थे। देश हथियारों से मजबूत नहीं होता, बल्कि हथियारों को चलाने वाले हाथों से मजबूत होता है। ये हाथ किसी के भी हो सकते हैं। जब बंदूकें देश के भीतर ही एक दूसरे पर तन जाएं तो किसी बाहरी दुश्मन की जरूरत ही कहां रह जाती है।
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