Ganga becomes Mahanadi in fond remembrance of Mahanand a disciple of Shringi Rishi

माँ गंगा कैसे बन गई महानदी, श्रृंगी ऋषि के तपोस्थल में हुआ जन्म

नगरी। नदियां धरती पर जीवन का आधार हैं। भारत में नदियों को माता की संज्ञा दी गई है। प्रत्येक नदी न केवल किसी न किसी सभ्यता का उद्गम है बल्कि इससे जुड़ी कथाएं और मान्यताएं भी बेहद प्रेरणास्पद होती हैं। एक ऐसी ही कथा है सिहावा में माँ गंगा के पधारने की और फिर महानदी बनकर यहां से बह निकलने की। यह कथा ऋषि श्रृंगी के अनन्य शिष्य महानंद के बलिदान से जुड़ी है। श्रृंगी ऋषि के अनुष्ठानों से ही भगवान राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का जन्म हुआ था।

महानदी का उद्गम सिहावा पर्वत से होता है। यह सप्तऋषियों की तपोस्थली रही है। पर्वत के शिखर पर महर्षि के आश्रम के पास स्थित कुंड को महानदी का उद्गम स्थल माना गया है। पर्वत शिखर को छेदती हुई महानदी गणेश घाट होती हुई 15 से 16 किलोमीटर दूरी तय कर ग्राम फरसिया स्थित महामाई धाम तक प्रवाहित होती है। यहां से उसका प्रवाह उत्तर पूर्व की ओर मुड़ जाता है।

ग्राम पंचायत फरसिया के जिस स्थान से महानदी वापस पश्चिम की ओर प्रवाहित होने लगी, उस स्थान पर महामाई माता का मंदिर स्थापित है, जो महामाई धाम के नाम से प्रसिद्ध है। इस तीर्थ स्थल में महामाई देवी, देवी भगवती एवं महर्षि श्रृंगी के शिष्य महानंद बाबा एवं मातेश्वरी चित्रोत्पला गंगा आदिकाल से विराजमान है।

किवदंती है कि एक बार इस क्षेत्र के सभी ऋषि कुंभ स्नान करने के लिए चल पडे। ऋषियों ने सोचा कि महर्षि श्रृंगी को भी साथ ले जाते हैं। ऋषिगण जब श्रृंगी ऋषि के आश्रम में पहुंचे, तो उन्हें तपस्या में लीन पाया। ऋषिगण बिना विघ्न डाले आगे बढ़ गए। कुंभ स्नान के बाद लौटते वक्त अपने-अपने कमंडल में गंगा जल भर कर लाए। महर्षि श्रृंगी के आश्रम पहुंचे तो श्रृंगी ऋषि अभी भी तपस्या में लीन थे। तब सभी ऋषियों ने अपने-अपने कमंडल का गंगाजल थोड़ा-थोड़ा श्रृंगी ऋषि के कमंडल में डालकर अपने- अपने आश्रमों के लिए चल पड़े।

श्रृंगी ऋषि की तपस्या से प्रसन्ना होकर गंगा मैय्या कमंडल से प्रकट हो गई, जिससे वहां पर रखा कमंडल गिर गया। तभी श्रृंगी ऋषि से गंगा मैय्या ने वरदान मांगने कहा, परन्तु उनका ध्यान नहीं टूटा। तब गंगा मैया क्रोधित होकर, पहाड़ को छेदकर तीव्र वेग के साथ पूर्व दिशा की ओर प्रवाहित होने लगी। जनधन की हानि होने लगी।

महर्षि श्रृंगी के शिष्य महानंद बाबा ने जनसंहार के पाप से श्रृंगी ऋषि को बचाने का जतन किया। ऋषि की तपस्या भंग करने आग जला दी। श्रृंगी ऋषि की तपस्या भंग हो गई और उन्होंने महानंद बाबा क्रोध से देखा। इससे वे जलकर भस्म हो गए।

श्रृंगी ऋषि ने जब ध्यान लगाकर देखा तब रहस्यों का पता चला। तब तक गंगा मैया बहुत दूर लगभग 16 किलोमीटर दूर ग्राम फरसिया पहुंच चुकी थीं। महर्षि ने गंगा मां से प्रार्थना कर वापस आने पुकार लगाई और पूर्व दिशा को छोड़कर जन कल्याण के लिए पश्चिम से होते हुए, उत्तर पूर्व दिशा में प्रवाहित हो गई। महामाया गंगा ने श्रृंगी ऋषि को आशीर्वाद देते हुए यह कहा कि तुम्हारे शिष्य ने गुरु सेवा में जो बलिदान दिया, वह सराहनीय है। मैं जहां तक जाऊंगी, तुम्हारे शिष्य के नाम की नदी कहलाऊंगी। ऐसा आशीर्वाद देकर महामाया गंगा, महानंद के नाम से महानदी बनकर पूरे छत्तीसगढ़ व बंगाल की खाड़ी तक जीवनदायिनी नदी बनकर प्रवाहित हो रही है।

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