गुस्ताखी माफ : यातायात सुरक्षा; नौ दिन चले अढ़ाई कोस
यातायात किसी भी देश के लिए एक बड़ी चुनौती होती है। खासकर तब जब उस देश के नागरिकों में और मवेशियों में कोई ज्यादा अन्तर न हो। शायद इसीलिए यातायात को किसी भी देश की शिक्षा, सभ्यता और संस्कृति का पैमाना भी माना जाता है। विश्व में सड़क दुर्घटनाओं से होने वाली मौतों के सबसे अधिक मामले भारत से सामने आते हैं, जहां प्रति वर्ष 1.5 लाख से अधिक मौतें होती हैं। इसा लिहाज से इसे दुनिया के सबसे खतरनाक देशों में से एक माना जाता है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यह देश के आबादी घनत्व के कारण है। वैसे आम लोगों का मानना है कि देश में यातायात के प्रति चेतना लुप्त प्राय है। इसे सुधारने के लिए 1989 में भारत के सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने ट्रैफिक सप्ताह (राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा सप्ताह) की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के लिए यातायात नियमों के पालन और सुरक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाना था। इसे हर साल 11 से 17 जनवरी के बीच मनाया जाता है। पर इसका नतीजा ढाक के तान पात जैसा ही है। देश में मनाए जाने वाले किसी भी अन्य दिवस या सप्ताह की तरह यह भी एक उत्सव की तरह है। इस दौरान स्कूली बच्चों को ट्रैफिक के नियमों की जानकारी दी जाती है। लेफ्ट राइट का कांसेप्ट सिखाया जाता है। पर आजकल इसका पूरा जोर हेल्मेट और सीट बेल्ट पर है। वैसे भी हमारा यहां ट्रैफिक पुलिस ट्रैफिक ठीक करने नहीं बल्कि दस्तावेजों की जांच करने के लिए सड़कों पर उतरती है। वैसे भी उसका मूल काम उद्देश्य राजस्व इकट्ठा करना है। ट्रैफिक का क्या है, जो सड़क पर उतरेगा, वह भुगत लेगा। मैदान में ड्राइविंग सीखने वाला सड़क पर भी बिंदास रहे तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। सड़क अच्छी बना दो तो रफ्तार बढ़ जाती है, चौड़ी कर दो वो और चौड़े हो जाते हैं। 1970-80 के दशक में जब गाड़ियों की संख्या कम थी, लोग स्वतः यातायात नियमों का पालन करते थे। पता नहीं यातायात पुलिस ने ऐसा क्या किया कि ज्यों-ज्यों दवा की मर्ज बढ़ता ही चला गया।
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