अजमेर दरगाह या संकट मोचन महादेव? 21 फरवरी पर टिकी निगाहें
अजमेर> राजस्थान के अजमेर जिले में स्थित विश्व प्रसिद्ध ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में शिव मंदिर होने के दावे को लेकर कानूनी लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने अजमेर सिविल कोर्ट में चल रही सुनवाई पर तुरंत रोक लगाने से इनकार कर दिया है। इस फैसले के बाद अब सबकी नजरें 21 फरवरी को होने वाली सुनवाई पर टिक गई हैं।
दरवेश समुदाय (ख्वाजा साहब के अनुयायी) ने सुप्रीम कोर्ट में प्रार्थना पत्र दायर कर दलील दी थी कि अजमेर कोर्ट में चल रही कार्यवाही ‘प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट-1991’ और दिसंबर 2024 के सुप्रीम कोर्ट के स्टे ऑर्डर का उल्लंघन है। हालांकि, देश की सबसे बड़ी अदालत ने हस्तक्षेप से इनकार करते हुए दो टूक कहा कि याचिकाकर्ता इस मामले में सीधे पक्षकार नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अजमेर सिविल कोर्ट ने अभी तक कोई अंतरिम या अंतिम आदेश पारित नहीं किया है, केवल नोटिस जारी किए हैं। कोर्ट ने यह भी दोहराया कि उनका पूर्व का आदेश सभी के लिए बाध्यकारी है, जिसका पालन निचली अदालतों को करना ही होगा।
अजमेर दरगाह के भीतर शिव मंदिर होने के दावे ने पिछले कुछ महीनों में रफ्तार पकड़ी है। हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने कोर्ट में याचिका लगा कर दरगाह परिसर में ‘संकट मोचन महादेव मंदिर’ होने का दावा किया था। दुआसरी तरफ महाराणा प्रताप सेना के अध्यक्ष ने भी दरगाह में मंदिर होने की बात कहते हुए नई याचिका दायर की। इन दोनों ही याचिकाओं पर अजमेर कोर्ट ने दरगाह कमेटी सहित तीन पक्षकारों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
21 फरवरी को अजमेर सिविल कोर्ट में होने वाली सुनवाई में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर सुनवाई हो सकती है। दरगाह कमेटी और अन्य पक्षकार कोर्ट में अपना आधिकारिक जवाब दाखिल करेंगे। वे संभवत ‘प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट 1991’ का हवाला देकर केस को खारिज करने की मांग करेंगे। हिंदू पक्ष की ओर से एएसआई सर्वे या कोर्ट कमिश्नर नियुक्त करने की मांग पर जोर दिया जा सकता है।
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