अद्भुत, अप्रतिम हैं ताला के रुद्रशिव, बने छत्तीसगढ़ की पहचान

अद्भुत, अप्रतिम हैं ताला के रुद्रशिव, बने छत्तीसगढ़ की पहचान

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में एक गाँव है  ताला। यह गांव पुरातात्किवक महत्व के देवरानी और जेठानी मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। यहां रुद्र शिव या पशुपति नाथ की एक अनोखी पत्थर की मूर्ति उत्खनन में सामने आई थी। लगभग 7 फीट ऊँची और लगभग 5 मीट्रिक टन वजनी यह प्रतिमा अपने आप में एक अजूबा है। यह न केवल अद्भुत बल्कि अप्रतिम है।

ताला गांव को मुख्यतः देवरानी-जेठानी मंदिरों के लिए जाना जाता है। रुद्र शिव की यह प्रतिमा देवरानी मंदिर के सामने मिट्टी में दबी थी। यह मूर्ति अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित है और एक छोटे से ढांचे में बंद करके रखी गई है। इस मूर्ति की विशिष्टता यह है कि चेहरे और शरीर के अंगों को विभिन्न जीवों और जानवरों द्वारा दर्शाया गया है, जो बहुत दुर्लभ है।

इतिहासकारों ने शिव के शरीर पर कई जीवों को देखकर इस मूर्ति को रुद्र शिव या पशुपति के रूप में व्याख्यायित किया है। मूर्ति के शरीर पर आठ मानव सिर उकेरे गए हैं, जिनमें मुख्य सिर भी शामिल है। प्रतिमा खड़ी मुद्रा में है। ताला की रुद्रशिव की मूर्ति शिल्पकला की अनोखी रचना है। लाल बलुआ पत्थर से बनी यह मूर्ति दो मीटर से भी अधिक ऊंची है। मूर्ति में बड़ी ही कलात्मकता से उभारे गए रुद्र अथवा उग्र भावों के कारण यह मूर्ति यक्ष जैसी प्रतीत होती है।

मूर्ति को रुद्रशिव या शिवजी का स्वरूप मानने का एक और संभावित कारण यह हो सकता है कि, शिवजी को पशुपतिनाथ अर्थात पशुओं के देवता भी कहा जाता है और इस मूर्ति में शारीरिक अंगों के रूप में उत्कीर्णित विविध पशुओं की आकृतियों द्वारा शिवजी का यह स्वरूप भलीभाँति उभरकर आता है। यह छत्तीसगढ़ की विशेषक मूर्ति हो सकती है।

इंडीटेल्स के अनुसार पशुओं और मनुष्यों की मुखाकृतियों से बनाए गए शारीरिक अंग इस मूर्ति को अद्वितीय बनाते हैं। इस मूर्ति का मुकुट साँप का बना हुआ है, जो बिलकुल पगड़ी के समान लगता है। नाक के स्थान पर गिरगिट बना हुआ है, जिसकी पूंछ बिच्छू के जैसी है। उसकी भौहें मेंढक के पावों जैसी हैं। नेत्रगोलक अंडों के समान हैं। कान मयूर के रूप में बनाए गए हैं। ठुड्डी के स्थान पर केकड़ा बना हुआ है। मूँछों के स्थान पर मछलियाँ बनी हुई हैं। कंधों की जगह मगरमच्छ का मुंह बना हुआ है। बाँहें हाथी की सूंड की तरह हैं।

उँगलियाँ साँप के मुख जैसी हैं – कुछ लोगों का कहना है कि वह पंचमुखी नाग है। वक्षस्थलों पर मनुष्यों की आकृतियाँ बनी हुई हैं – शायद वह जुड़वा हो। पेट क स्थान पर एक गोलाकार मनुष्य का मुख बना हुआ है – शायद वह कुंभ को दर्शाता हो। जांघों पर विद्याधर की आकृतियाँ बनी हुई हैं – यह मत्स्यकन्या हो सकती हैं – या हो सकता है कि वह तुला को भी दर्शाती हों। जांघों की बाजुओं पर गंधर्व की आकृतियाँ बनी हुई हैं – शायद यह भी मत्स्यकन्या हो सकती है। घुटनों के स्थान पर सिंह का मुख बना हुआ है – जो शायद सिंह राशि को दर्शाता हो। पाँव हाथी के जैसे हैं। दोनों कंधों पर रक्षक के रूप में दो साँप बने हुए हैं। मूर्ति के बाईं तरफ भी एक साँप बना हुआ है।

मूर्ति में समाहित कुछ पशु विविध ज्योतिषीय चिह्नों से भी संबंधित हैं। जैसे कि जुड़वा व्यक्तियों की वह आकृतियाँ जो मिथुन राशि से जुड़ी हुई हैं, कुंभ की आकृति जो कुंभ राशि से जुड़ी है, सिंह की आकृति सिंह राशि को दर्शाती है, विद्याधर या तुला की आकृतियाँ तुला राशि से संबंधित हैं, मगरमच्छ की आकृति मकर राशि को दर्शाती है, मत्स्यकन्याओं की आकृतियाँ कन्या राशि से संबंधित हैं, बिच्छू की आकृति वृश्चिक राशि से जुड़ी है और केकड़ा कर्क राशि को दर्शाता है, आदि। कुछ स्थानीय लोगों का कहना है कि इस मूर्ति में सभी 12 राशियों या ज्योतिषीय चिह्नों का समावेश है। यद्यपि इन से संबंधित इससे अधिक जानकारी मुझे नहीं मिल पायी।

देवरानी – जेठानी मंदिर परिसर
देवरानी – जेठानी मंदिरों का वह परिसर, जहाँ पर आज यह मूर्ति रखी गयी है, गुप्त काल के दौरान बनवाया गया था। लेकिन इस मूर्ति के निर्माण-काल के संबंध में वहाँ पर कोई जानकारी नहीं मिलती। मूर्तिकला की दृष्टि से भी यह मूर्ति बहुत अनोखी है और उसे किसी निश्चित काल से जोड़ना थोड़ा कठिन है। उसकी स्थूलता को देखा जाए तो यह मूर्ति पुरातन काल की हो सकती है, या फिर थोड़ा बाद में निर्मित लोक कला का एक अद्भुत नमूना हो सकती है।

कलाकृति
ताला की रुद्रशिव की इस मूर्ति के दर्शन करना जैसे, इतिहास के किसी छूटे हुए किस्से की खोज करने जैसा था। जैसे कि मैंने शिवसागर के अहोम राजवंश की खोज की थी। इस मूर्ति की विचित्र सी शिल्पकला मुझे आज भी उसकी ओर आकर्षित करती है। क्या वह किसी चित्रकार की कल्पना का वास्तविकरण हो सकती है? या फिर किसी पशु-प्रेमी या किसी ज्योतिषी द्वारा की गयी मनुष्य के शरीर की व्याख्या? क्या वह अपने प्रकार का एक ही रचनांश है, या फिर उसकी समकालीन कुछ अन्य प्रतिमाएँ भी हो सकती हैं?

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