प्राचीन मेले का अपशकुन, उद्घाटन करने वाले की चली जाती है कुर्सी

प्राचीन मेले का अपशकुन, उद्घाटन करने वाले की चली जाती है कुर्सी

दुमक। झारखंड के दुमका जिला मुख्यालय से तीन किलोमीटर दूर मयूराक्षी नदी के पावन तट पर शुक्रवार से राजकीय जनजातीय हिजला मेला महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। प्रकृति की गोद में बसे इस मेले ने एक बार फिर जनजातीय परंपराओं, आस्था और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत कर दिया।पर आपको बता दें कि यह मेला नेताओं पर भारी पड़ता है। इस मेले का उद्घाटन करने वाले कई मुख्यमंत्रियों की कुर्सी चली गई। कहा जाता है कि हिजला मेला के उद्घाटन करने के बाद चार मुख्यमंत्रियों की कुर्सी पर आफत आ गई, इस कारण अब कोई भी मुख्यमंत्री, मंत्री, नेता या अफसर हिजला मेला के उद्घाटन करने से कतराते हैं। अब ग्राम प्रधान की ओर से हप मेले का उद्घाटन किया जाता है।
जानकार बताते है कि 1988 में तत्कालीन सीएम बिंदेश्वरी दुबे ने हिजला मेले का उद्घाटन किया और कुछ महीने बाद उनकी कुर्सी चली गई थी। इसी तरह से भागवत झा आजाद, सत्येंद्र नारायण सिंह और डॉ. जगन्नाथ मिश्र ने भी हिजला मेले का उद्घाटन किया,लेकिन अलग-अलग कारणों से उनकी कुर्सी चली गई।
सत्येंद्र नारायण सिंह बिहार के नए सीएम हुए और उन्हें इस मेले में आने के बाद कुर्सी से बेदखल होना पड़ा।
वर्ष 1890 से शुरू हिजला मेला के शुभारंभ के पूर्व उल्लास जुलूस मानो जनजातीय अस्मिता का चलता-फिरता चित्र बन गया। रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों में सजे आदिवासी समाज के पुरुष एवं महिलाएं, हाथों में अपने पारंपरिक वाद्ययंत्र लिए, जब पूरे जोश और गर्व के साथ आगे बढ़ रहे थे, तब वातावरण उनकी सांस्कृतिक धड़कनों से गूंज उठा।
महोत्सव की औपचारिक शुरुआत से पहले हिजला मेला परिसर स्थित मांझी थान में विधिपूर्वक पूजा-अर्चना की गई। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि अपनी जड़ों, परंपराओं और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का भावपूर्ण प्रदर्शन भी था। हिजला गांव के ग्राम प्रधान ने परम्परागत तरीके से फीता काटकर मेले का उद्घाटन किया। इस मौके पर दुमका के अनुमंडल पदाधिकारी कौशल कुमार ने मंच के समीप ध्वजारोहण कर कार्यक्रम को औपचारिक रूप से प्रारंभ किया।पारंपरिक रीति रिवाज एवं पगड़ी पहनाकर अतिथियों का स्वागत किया गया।
इस मौके पर उपायुक्त अभिजीत सिन्हा ने कहा कि यह 136वां हिजला मेला केवल एक वार्षिक आयोजन नहीं, बल्कि इस क्षेत्र की जीवंत सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है। उन्होंने गर्व के साथ कहा कि यह मेला समृद्ध जनजातीय संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक मूल्यों को सशक्त रूप से प्रदर्शित करता है। उन्होंने कहा कि हिजला मेला प्राचीनता और आधुनिकता का अद्भुत संगम है। यहां एक ओर जहां सदियों पुरानी परंपराएं, लोककला और रीति-रिवाज जीवंत रूप में दिखाई देते हैं, वहीं दूसरी ओर आधुनिक सुविधाएँ और व्यवस्थाएँ भी इस आयोजन को नई पहचान दे रही हैं। यही संतुलन इस मेले को विशिष्ट बनाता है।

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