FIR दर FIR पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, यह कानून का दुरुपयोग
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि अगर किसी आरोपी को अदालत से जमानत मिल जाती है, तो उसे जेल में बनाए रखने के लिए बार-बार नई FIR दर्ज करना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। कोर्ट ने साफ कहा कि यह तरीका संविधान के अनुच्छेद 32 (मौलिक अधिकार) के तहत सीधे हस्तक्षेप की मांग करता है। यह मामला झारखंड का है।
नवभारत टाइम्स की खबर के अनुसार 20 मई 2025 को रांची के एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) ने भारतीय दंड संहिता (IPC) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत पहली एफआईआर दर्ज की थी। इसी मामले में आरोपी से पूछताछ चल रही थी, तभी एसीबी हजारीबाग ने वर्ष 2010 में कथित वन भूमि के म्यूटेशन से जुड़े मामले में दूसरी एफआईआर दर्ज कर दी। यह मामला करीब 15 साल पुरानी घटना से जुड़ा था। इसके बाद 2025 में दो और एफआईआर दर्ज की गई।
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका दायर की। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य सरकार जानबूझकर एक के बाद एक एफआईआर दर्ज कर रही है, ताकि जमानत मिलने के बावजूद आरोपी जेल में ही रहे। उनका कहना था कि यह अदालत के जमानत आदेश को बेअसर करने की सोची-समझी कोशिश है।
जानबूझकर किया परेशान
कोर्ट सुप्रीम कोर्ट कोर्ट ने पाया कि आरोपी को जानबूझकर हिरासत में रखा गया। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी नोट किया कि 17 दिसंबर 2025 को जमानत मिलने के बाद भी 19 दिसंबर को एक अन्य एफआईआर में उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया और 20 दिसंबर को एक और मामले में सात दिन की रिमाड दे दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में डॉ. बी.आर. आंबेडकर के उस कथन का जिक्र किया, जिसमें उन्होंने अनुच्छेद 32 को संविधान की आत्मा बताया था।
आर्टिकल 32 क्यों है अहम
सुप्रीम कोर्ट सविधान का प्रोटेक्टर है। अगर किसी के मौलिक अधिकार का उल्लंघन होता है तो वह शख्स सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद-32 और हाई कोर्ट में अनुच्छेद-226 का सहारा ले सकता है। मौलिक अधिकारो के उल्लंघन के मामले में निचली अदालत नहीं जा सकते बल्कि सीधे हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद-32 की अहमियत को बताते हुए याची को रिलीफ दी है और ऐसे में निश्चित तौर पर अनुच्छेद-32 संविधान की आत्मा है।
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