गर्ल्स हॉस्टल में भूतों का डेरा, स्वास्थ्य अमले के साथ पहुंचा बैगा भी
हॉस्टल अधीक्षिका ने जिला शिक्षा अधिकारी से की सलाह-मशविरा
कोरबा। छात्रावासों में भूत प्रेत का साया होने की बातेंं अकसर सुनने में आती हैं। इसकी पृष्ठभूमि में अकसर इन स्थानों परहुए हादसे होते हैं। सुनी सुनाई कहानियां हॉस्टल के रहवासी मिर्च मसाला लगाकर आगे बढ़ाते रहते हैं और फिर जन्म होता है भूतों का। पर कभी कभी ऐसी कोई कहानी नहीं होती पर छात्र-छात्राएं असामान्य हरकतें करने लगती हैं। एक ऐसी ही घटना सामने आई है पोड़ी कन्या छात्रावास में। हालात इतने बुरे हुए कि स्वास्थ्य अमले को बुलाना पड़ा। कुछ छात्राओ के परिजन तो बैगा भी बुला लाए।
जिले के पोड़ी उपरोड़ा विकासखंड अंतर्गत पोड़ी में संचालित 100 सीटर कन्या छात्रावास से एक सनसनीखेज खबर निकलकर सामने आई है। यहां अध्यनरत कुछ छात्राओं की हरकतें असामान्य होने लगती हैं। लगभग 10 से 12 छात्राएं इस तरह के घटनाक्रम से पिछले कुछ दिन से पीडि़त बताई जा रही हैं जिन्हें लेकर जब बात हॉस्टल से परिजन तक पहुंची तो उन्होंने भूत-प्रेत का साया पडऩे की बात कही।
नाम न उजागर करने की शर्त पर परिजन के साथ आए रिश्तेदार ने बताया कि उनके बच्चे भूत-प्रेत के साए में हैं। एक परिजन ने तो बैगा को ला कर हॉस्टल में इलाज भी करने का प्रयास किया। परिजनों का आरोप है कि हॉस्टल में आने पर माता-पिता को भी बच्चों से मिलने नहीं दिया जाता है और बच्चों की तबीयत खराब इस तरह से रहेगी तो उन पर क्या बीतेगी?
बहरहाल पोड़ी उपरोड़ा ब्लॉक के एक ग्राम से कुछ लोग अपने बच्चों को लेने पहुंचे थे। उनके एक रिश्तेदार ने बताया कि विगत 3 वर्ष के दौरान 8 से 10 लड़कियां इस तरह से असामान्य हरकतें करते उसने देखी है और यहां भूत-प्रेत का साया है। एक मालवाहन भी साथ में लाया गया था जिसमें पीडि़त बच्ची को लेकर परिजन बैग के साथ गांव के लिए रवाना होंगे। समाचार लिखे जाने तक यह गतिविधि यहां जारी थी।
घटना के संबंध में जानकारी लेने के लिए पोड़ी बीईओ श्री दयाल से संपर्क किया गया लेकिन उनका फोन रिसीव नहीं हुआ। सूत्र बताते हैं कि हॉस्टल अधीक्षिका ने प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी टी पी उपाध्यायको घटना की जानकारी दे दी है और वह संभवत: पोड़ी पहुंच रहे हैं, उनसे भी टेलीफोनिक सम्पर्क नहीं हो सका है। इस पूरे घटनाक्रम को लेकर भूत-प्रेत का साया होने की पुष्टि हम नहीं करते लेकिन परिजन ने ऐसी बात कही है। वैज्ञानिक युग में जब इंसान चांद तक पहुंच चुका है, तब ऐसी बातें अंधविश्वास के तौर पर देखी जाती हैं लेकिन ग्रामीण अंचलों में आज भी इसे सही माना जाता है।
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