बांग्लादेश बॉर्डर की निगरानी करेंगे सांप और मगरमच्छ, BSF ने बनाया प्लान
कोलकाता। भारत-बांग्लादेश बॉर्डर पर अब बीएसएफ सापों और मगरमच्छों की तैनाती करने जा रही है। BSF का मास्टर प्लान तैयार है। आम तौर पर घुसपैठिए उथले पानी वाले इलाकों से चलकर सीमा पार करते हैं। बीएसएफ का प्लान है कि दलदली क्षेत्रों और उथले पानी वाले इलाकों में मगरमच्छ और पानी वाली सांपों को छोड़ दिया जाए। इससे लोग पानी के रास्ते से आने की हिम्मत नहीं जुटा पाएंगे।
दिलचस्प बात यह है कि भारत-बांग्लादेश सीमा के कुछ हिस्सों- खासकर सुंदरबन जैसे पर्यावरण के लिहाज़ से संवेदनशील इलाकों में पहले से ही मगरमच्छों के रहने की जगहें मौजूद हैं। यह स्वाभाविक रूप से ही बिना इजाज़त होने वाली आवाजाही को रोकने का काम करती हैं। हालांकि, अब तक इन्हें सीमा की सुरक्षा से जुड़ी किसी भी औपचारिक रणनीति का हिस्सा नहीं बनाया गया है। अगर इस प्रस्ताव को लागू किया जाता है, तो सरीसृपों का इस्तेमाल भारत की सीमा प्रबंधन प्रणाली के लिए अब तक सोचे गए सबसे अनोखे रणनीतिक उपायों में से एक होगा। यह न केवल सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियों की जटिलता को दर्शाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि मुश्किल सुरक्षा-कमियों को दूर करने के लिए अधिकारी किस हद तक जाने को तैयार हो सकते हैं।
BSF का यह प्रस्ताव कई स्तरों वाली सीमा सुरक्षा रणनीति का हिस्सा है। भारत की सबसे संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय सीमाओं में से एक पर पारंपरिक निगरानी, आधुनिक तकनीक और इलाके के हिसाब से खास उपायों के साथ यह भी शामिल किए जाने की तैयारी है। भारत- बांग्लादेश बॉर्डर 4096 किमी तक फैला है।
BSF का यह प्रस्ताव 9 फरवरी को डायरेक्टर जनरल प्रवीण कुमार की अध्यक्षता में हुई एक बैठक में बना था। 20 मार्च को नई दिल्ली स्थित BSF मुख्यालय में हुई एक और हाई लेवल बैठक में इस विचार पर फिर से चर्चा की गई। इसके बाद पूर्वी और उत्तर-पूर्वी सेक्टरों में सीमा-स्तरीय अधिकारियों को संदेश भेजे गए।
ऐसे ही एक निर्देश में सेक्टर मुख्यालयों को गृह मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशों के अनुसार नदी के खाली हिस्सों में रेंगने वाले जीवों के इस्तेमाल की संभावना तलाशते हुए कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया। इस प्रस्ताव की ऑपरेशनल नज़रिए से जांच करने और तय समय सीमा के भीतर की गई कार्रवाई की रिपोर्ट जमा करने को कहा गया है।
भारत-बांग्लादेश सीमा अलग-अलग और मुश्किल इलाकों से गुज़रती है, जिनमें घनी आबादी वाले इलाके, जंगल, पहाड़, दलदली ज़मीनें और नदी-तटीय इलाके शामिल हैं। इनमें से कई इलाके घुसपैठ, तस्करी और दूसरी गैर-कानूनी गतिविधियों के लिहाज़ से संवेदनशील बने रहते हैं। BSF लंबे समय से हथियारबंद गश्त, चौबीसों घंटे चौकसी और कभी-कभार बल प्रयोग पर निर्भर रही है। वहीं हाल के सालों में इस बल ने तेज़ी से टेक्नोलॉजी पर आधारित सुरक्षा मॉडल अपनाया है।
निगरानी के मौजूदा उपायों में तेज़ी से लगाई जा रही ‘एंटी-कट’ और ‘एंटी-क्लाइंब’ बाड़, निगरानी ड्रोन, GPS-सक्षम ट्रैकिंग सिस्टम, थर्मल इमेजर और पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम जैसे राज्यों में सीमा के कुछ हिस्सों में बिजली वाली बाड़ शामिल हैं। खास तौर पर संवेदनशील नदी-तटीय इलाकों में, BSF ने ‘व्यापक एकीकृत सीमा प्रबंधन प्रणाली’ (CIBMS) के तहत निगरानी को और मज़बूत किया है। इसमें ‘BOLD-QIT’ प्रोजेक्ट भी शामिल है, जो 24×7 निगरानी के लिए सेंसर, इंफ्रारेड और नाइट-विज़न कैमरों, और ड्रोन का इस्तेमाल करता है।
BSF ने हाल के सालों में अपने निगरानी ढांचे को काफी बेहतर बनाया है। बताया जाता है कि 5000 से ज़्यादा ‘बॉडी-वॉर्न कैमरे’ (शरीर पर पहने जाने वाले कैमरे) जिनमें नाइट-विज़न की क्षमता है, जवानों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे हैं। AI-सक्षम निगरानी कैमरे भी लगाए जा रहे हैं। संदिग्धों के फिंगरप्रिंट और आइरिस स्कैन लेने के लिए बायोमेट्रिक उपकरणों का भी इस्तेमाल किया जा रहा है।
नदी-तटीय इलाकों में ऑपरेशन के लिए, यह बल फिलहाल खास तरह के जलयान, स्पीडबोट और पानी पर तैरते ‘सीमा चौकियां’ (BOPs) तैनात करता है। नियमित फिजिकल पेट्रोलिंग होती है। सरीसृपों (रेप्टाइल्स) को तैनात करने के प्रस्ताव के साथ-साथ, 20 मार्च को हुई बैठक में पूर्वी भारत में मौजूद सेक्टर मुख्यालयों को यह निर्देश भी दिया गया कि वे उन ‘डार्क ज़ोन’ (अंधेरे इलाकों) में स्थित सीमा चौकियों की पहचान करें, जहां मोबाइल नेटवर्क की कनेक्टिविटी नहीं है।
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