रेलवे स्लीपर के लिए इस वन टांगिया समुदाय ने उगाए साखू के जंगल

रेलवे स्लीपर के लिए इस वन टांगिया समुदाय ने उगाए साखू के जंगल

नई दिल्ली। रेल की पटरियों का जिक्र आता है तो सबसे पहले याद आती है भिलाई इस्पात संयंत्र की जिसने आजाद भारत में सबसे ज्यादा रेल पटरियों का निर्माण किया। पर हम भूल जाते हैं उन स्लीपरों को जिनपर पटरियों को बिछाया जाता है। आज भले ही पटरियं कंक्रीट के स्लीपरों पर बिछाई जाती हों पर इसका आरंभ लकड़ी के स्लीपरों से हुआ था। एक किलोमीटर पटरी बिछाने के लिए साखू के 60 पेड़ों की जरूरत पड़ती थी। साखू के इन्हीं पेड़ों के लिए जन्म हुआ वन टांगिया समुदाय का।

रेलवे स्लीपर के लिए इस वन टांगिया समुदाय ने उगाए साखू के जंगल

1918 के आसपास देश में रेलवे नेटवर्क का विकास प्रारंभ हो चुका था। बड़े पैमाने पर लकड़ी के स्लीपरों की आवश्यकता था। स्लीपर साखू के पेड़ों से बनाए जाते थे। बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई होने लगी। ऐसे में अंग्रेजों ने वन टांगिया समुदाय को वनों में बसा दिया। ये साखू के पेड़ लगाते। 15-15 फीट की दूरी पर पेड़ लगाए जाते और इनके बीच की जगह पर खेती की जाती। उपज का आधा सरकार का होता और आधा इस समुदाय का।

कहा जाता है कि वन टांगिया समुदाय के लोगों को म्यांमार से लाकर बसाया गया था। लंबे समय तक किसी भी सरकार ने इनकी सुधि नहीं ली। चूंकि ये वन ग्रामों में रहते थे और इनकी आबादी अधिक नहीं थी, इसलिए इन्हें कभी पहचान नहीं मिली, न ही इनके लिए कभी कोई योजना बनी। पर अब हालात बदलने लगे हैं। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने इन्हें भी मुख्यधारा में लाने की कोशिश शुरू कर दी है।

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, महराजगंज, गोंडा जिलों में वनटांगिया समुदाय की लगभग 60,000 आबादी है, जो लंबे समय तक बाहरी दुनिया से कटी हुई थी और शिक्षा, भोजन एवं स्वास्थ्य देखभाल जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रही थी। समुदाय की महिलाओं ने बाहर की दुनिया नहीं देखी थी, अब वो जंगलों से निकलकर सांस्कृतिक मंचों पर अपनी कला की प्रस्तुति दे रही हैं।

गोरखपुर के वनटांगिया गांव में रहने वाली नीतू देवी कहती हैं, हमें तो लगता था कि इसी जंगल में पैदा हुए और यहीं बकरी चराते हुए जीवन खत्म हो जाएगा। ऐसे ही हमारे बच्चे भी इन्हीं जंगलों में रह जाएंगे। सैंकड़ों-हजारों लोगों के सामने स्टेज पर डांस करने या चलने (रैम्प वॉक) का तो कभी ख्याल भी नहीं आया। पिछले करीब सालभर में शहरों में जाकर विभिन्न महोत्सवों और अन्य अवसरों पर प्रस्तुति दी है। पहली बार ट्रेन में बैठे, होटल में रुके, वहां का खाना खाया। अब बच्चों के लिए नए सपने देखने लगे हैं। हालांकि, परिवार को समझाना आज भी चुनौती है।

#वनटांगिया महिलाओं की कला को मंच के रूप में आमदनी का नया जरिया मिला है। मेजबान सारी व्यवस्था करते हैं और पारिश्रमिक भी देते हैं। रिंकी बताती हैं, गोरखपुर महोत्सव, आगरा के ताज महोत्सव, वाराणसी में जी-20 व गंगा महोत्सव, मथुरा, महाराजगंज में कार्यक्रम किए हैं। कार्यक्रमों से मिले पैसों को भविष्य के लिए संभालकर रखा है।

वहीं, सपना कहती हैं, दूसरों के खेतों में मजदूरी करने में जीवन गुजर रहा था। अब हमारी भी पहचान बनी है। तनु निषाद कहती हैं, सब्जी फार्म पर काम करके एक दिन में 200 रुपये मिलते हैं। लेकिन, रोज काम नहीं मिलता। सरकार कुछ ऐसी व्यवस्था कर दे कि लगातार कार्यक्रम मिलते रहें, तो जीवन सुधर जाएगा।

वनटांगिया महिलाओं को मंच दिलाने में दिल्ली हाईकोर्ट की अधिवक्ता सुगम सिंह शेखावत की भूमिका अहम रही है। वह कहती हैं, वनटांगिया गांवों में जाकर इन महिलाओं और उनके घरवालों को समझाना मुश्किल था। कोई घूंघट हटाने को तैयार नहीं था। काफी प्रयास के बाद कुछ महिलाएं तैयार हुई हैं। जंगलों में ही उन्हें डांस और रैम्प वॉक की ट्रेनिंग दी गई।

ब्रिटिश शासन के समय रेल की पटरी बिछाने में उपयोग होने वाली लकड़ी की मांग को पूरा करने के लिए साखू के पेड़ लगाने और उनकी देखरेख करने के लिए 1918 में गरीब भूमिहीन मजदूरों को जंगल में बसाया गया। गोरखपुर, गोंडा, महाराजगंज में लगभग 23 वनटांगिया गांव हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मई, 2018 में वनटांगिया गांवों को राजस्व ग्राम घोषित किया और इन्हें मुख्यधारा से जोड़ने की पहल की। इसके बाद, यहां सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाएं पहुंचनी शुरू हुई हैं।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग की प्रोफेसर डॉ कीर्ति पांडेय कहती हैं, कुछ समय पहले पूर्वांचल के इस आदिवासी समुदाय के बारे में कम लोग जानते थे। योगी आदित्यनाथ ने बतौर सीएम इनके गांव में जाना शुरू किया, तो लोग जानने लगे। सामाजिक, आर्थिक या सांस्कृतिक बदलाव के लिए इंटर-माइग्रेशन जरूरी है। मतलब, एक गांव से दूसरे गांव जाना, दूसरे शहर जाना। इसके लिए, कनेक्टीविटी चाहिए। कई जगह इनके गांवों में सड़कें बनी हैं। लेकिन, बहुत जगह अब भी इसकी समस्या है। जब यह काम पूरा हो जाएगा, तो इस समुदाय का अन्य लोगों से संपर्क बढ़ेगा और इनके जीवन में भी व्यावसायिक गतिशीलता आने लगेगी।

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