विदेशों में राइनोप्लास्टी (नाक की सर्जरी) ज्यादा, पर वजह अलग
रायपुर। राइनोप्लास्टी (Rhinoplasty), जिसे “नोज जॉब” भी कहा जाता है, एक प्लास्टिक सर्जरी प्रक्रिया है जो नाक के आकार, रूप-रंग और कार्य (सांस लेने) में सुधार करती है। इसका उपयोग जन्मजात दोषों, चोटों, या संरचनात्मक समस्याओं (जैसे टेढ़ी नाक या सांस की तकलीफ) को ठीक करने के लिए किया जाता है, जिससे चेहरे का संतुलन और आत्मविश्वास बढ़ता है। विदेशों में भी बड़ी तादाद में लोग राइनोप्लास्टी करवाते हैं पर यहां इसकी वजह कुछ और है।
भारत में राइनोप्लास्टी तमाम उन्हीं कारणों से की जाती है जिसके लिए इसकी ईजाद हुई थी। पर यूरोप और अमेरिका में नशे की लत भी नाक का खेल बिगाड़ रही है। इंग्लैंड के प्लास्टिक-सर्जन डॉ.नासिर ने बताया कि यूके में कॉस्मेटिक राइनो-प्लास्टी का चलन काफी बड़ा है। भारत में भी अब इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है। यहां जन्मजात विकृति, चोट या कटे होंठ-तालू के बाद नाक की डिफॉर्मिटी के केस ज्यादा मिलते हैं। वहीं इंग्लैंड में कोकीन जैसे नशे के कारण सेप्टम खराब होने के मामले अधिक हैं, जिसे ‘कोकीन राइनोप्लास्टी’ कहा जाता है।
डॉ नासिर कुछ जटिल मामलों की सर्जरी करने के लिए कालड़ा बर्न एंड प्लास्टिक सर्जरी सेंटर में आमंत्रित थे। इस अवसर पर डॉ सुनील कालड़ा ने उनसे बातचीत की। डॉ. नासिर और डॉ. सुनील कालड़ा ने मिलकर 10 जटिल मामलों की सफल सर्जरी की। वर्कशॉप में देशभर से पहुंचे प्लास्टिक सर्जनों ने आधुनिक तकनीकों का प्रशिक्षण लिया।
डॉ नासिर ने बताया कि कुछ लोग जन्म से ही चौड़ी, टेढ़ी या मोटी नाक के साथ होते हैं। कई बार बचपन में चोट लगने से हड्डी टेढ़ी हो जाती है। बड़े होने पर वे कॉस्मेटिक सुधार के लिए आते हैं। नाक चेहरे का प्रमुख आकर्षण है। कई लोग अपने पसंदीदा सेलिब्रिटी जैसी प्रोफाइल चाहते हैं। इसलिए भी कॉस्मेटिक सर्जरी के केस बढ़े हैं।
यह कॉस्मेटिक सर्जरी की सबसे जटिल प्रक्रियाओं में से एक है। इसमें हड्डी, कार्टिलेज और त्वचा की संरचना को ध्यान में रखना पड़ता है। प्रशिक्षित प्लास्टिक सर्जन और अच्छे सेटअप में सर्जरी कराने से जोखिम न्यूनतम रहता है, अन्यथा संक्रमण या विकृति की आशंका हो सकती है।
जरूरत पड़ने पर पसली की कार्टिलेज, कान के पीछे या सेप्टम से टिश्यू लेकर नाक का आकार दिया जाता है। जिन मरीजों को सांस लेने में दिक्कत होती है, उनमें सेप्टोप्लास्टी भी की जाती है। सर्जरी के बाद 1–2 सप्ताह तक पट्टी लगती है। सूजन तीन माह तक रह सकती है और जरूरत होने पर दूसरी स्टेज की सर्जरी 9 माह बाद की जाती है।
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