राष्ट्रीय पाण्डुलिपि सर्वेक्षण : पं. लक्षणधारी मिश्र की दुर्लभ पाण्डुलिपियां संरक्षित

राष्ट्रीय पाण्डुलिपि सर्वेक्षण : पं. लक्षणधारी मिश्र की दुर्लभ पाण्डुलिपियां संरक्षित

अम्बिकापुर। सरगुजा की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विरासत को संजोने की दिशा में राष्ट्रीय पाण्डुलिपि सर्वेक्षण अभियान के अंतर्गत एक महत्वपूर्ण उपलब्धि सामने आई है। डी.सी. रोड निवासी रासबिहारी मिश्र के पास सुप्रसिद्ध साहित्यकार स्वर्गीय पंडित लक्षण धारी मिश्र की दुर्लभ पाण्डुलिपियों का समृद्ध भंडार सुरक्षित पाया गया है। इन पाण्डुलिपियों को संरक्षित एवं डिजिटल रूप में सुरक्षित करने का कार्य गौरव पाठक एवं उनके सहयोगियों द्वारा अत्यंत कुशलता एवं समर्पण के साथ किया गया।

उल्लेखनीय है कि “कृपमयी कृपा करो प्रणाम बार-बार है” जैसी लोकप्रिय एवं अद्वितीय मां महामाया आरती के रचयिता पं. लक्षण धारी मिश्र सरगुजा के शीर्षस्थ साहित्यकारों में गिने जाते हैं। चर्चा के दौरान श्री रासबिहारी मिश्र ने बताया कि हरिवंशराय बच्चन की “मधुशाला” से प्रेरित होकर पं. मिश्र ने “मृगछाला” की रचना की थी। वे महाप्राण निराला के समकालीन साहित्यकार थे तथा “मसान” उनका प्रसिद्ध खण्ड काव्य माना जाता है। पं. लक्षण धारी मिश्र का व्यक्तित्व केवल साहित्य तक सीमित नहीं था, बल्कि वे राष्ट्रवादी चिंतन से भी जुड़े रहे। बताया जाता है कि वे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ जेल में भी रहे थे। जेल प्रवास के दौरान ही उन्होंने “बंदी जीवन का गान” नामक काव्य की रचना की थी। साहित्य की लगभग प्रत्येक विधा में उनकी लेखनी चली और उन्होंने सरगुजा की साहित्यिक पहचान को नई ऊंचाई प्रदान की। राष्ट्रीय पाण्डुलिपि सर्वेक्षण अभियान के सुखद परिणाम अब धीरे-धीरे सामने आ रहे हैं। इन दुर्लभ पाण्डुलिपियों का संरक्षण शासन स्तर पर किया जाएगा। साथ ही समाज के प्रबुद्ध एवं संपन्न वर्ग से भी अपेक्षा की गई है कि वे स्वस्फूर्त आगे आकर ऐसी पाण्डुलिपियों को पुस्तकाकार प्रकाशित कराने में सहयोग दें, ताकि यह साहित्यिक धरोहर भावी पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत बन सके।

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