वीवायटी साईंस कालेज दुर्ग में पतंग महोत्सव का आयोजन

वीवायटी साईंस कालेज दुर्ग में पतंग महोत्सव का आयोजन

दुर्ग। मकर सक्रांति के उपलक्ष्य में विश्वनाथ यादव तामस्कर साइंस कॉलेज में विज्ञान क्लब की ओर से पतंग महोत्सव का आयोजन किया गया। विद्यार्थियों ने स्वयं से निर्मित पतंगों का प्रदर्शन किया। प्राचार्य डाॅ. अजय सिंह ने पतंग उड़ाकर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। इस अवसर पर डाॅ. अजय कुमार सिंह ने पतंग को जीवन का आधार बताया। उन्होंने कहा, यदि जीवन में पतंग की तरह डोर मजबूत हो और सही नेतृत्व के हाथों में हो तो पतंग या हमारा जीवन उचांईयों को छूता है। वास्तव में भारत आदिकाल से बदलाव का समर्थक रहा है। हम प्रकृति के हर बदलाव को स्वीकार करते है जैसे – गर्मी से बरसात हो तो सावन में त्यौहारों की झड़ी लग जाती है। बरसात से ठंड का स्वागत हम नवरात्रि, दषहरा, दीपावली आदि मनाकर करते है, जबकि गर्मी के स्वागत में गर्मी की प्रचंडता को स्वीकार करने के लिए चैत्र नवरात्र और रंग महोत्सव होली मनायी जाती है। मकर संक्राति भी एक बदलाव का उत्सव है, जिसमें सूर्य, धनु राषि से निकलकर मकर राषि में प्रवेष करता है, तो सूर्य दक्षिणयान से उत्तरायन हो जाता है, रात्रि की अपेक्षा दिन की लंबाई बढ़ने लगती है, और आत्मा, चेतना और जीवन के स्त्रोत सूर्य की उपासना के लिये समय बढ़ जाता है।

प्राचार्य ने विद्यार्थियों का आव्हान करते हुए कहा कि इसी प्रकार अब वे स्वयं के प्रति जागरूक हो और पतंग की तरह अपने जीवन को उंचा उठायें।
विज्ञान क्लब की संयोजक डाॅ. प्रज्ञा कुलकर्णी ने पतंग की उड़ान के पीछे के विज्ञान को समझाते हुए बताया कि पतंग उड़ना वायु गति की बलों के संतुलन का परिणाम है, जिसमें उठान,घर्षण, गुरूत्तव आर्कषण और डोरी का तनाव शामिल होता है। जब पतंग हवा में उपर नीचे होती है, तो वायुदाब ने अंतर उत्पन्न होता है। पतंग की डोरी एक निष्चित झुके हुए कोण पर रखी जाती है, जिससे हवा नीचे की ओर मुड़ती है, प्रतिक्रिया में पतंग उपर उठती है। डोरी का तनाव और घर्षण बल पतंग को स्थिर रखने में सहायता करते है। पतंग के हल्के होने के कारण उत्पन्न उठान, बल गुरूत्वकर्षण पर विजय पा लेता है, और पतंग आकाष में उड़ती रहती है। विद्यार्थियों ने इस तरह पतंग उड़ाने की वैज्ञानिक व्याख्या शायद पहली बार ही सुनी होगी।
कड़ाके की ठंड में रजाई के अंदर छुपे रहने के कारण शरीर में विटामिन डी की कमी हो जाती है। जब पतंग की आड़ में हम धूप सेंकते हुए हाथ, पैर चलाने का थोड़ा व्यायाम करते है, तो हमारे जोड़े में विटामिन डी बनने की प्रक्रिया बढ़ जाती है, इस प्रकार हमें मनोरंजन के साथ-साथ स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है।

भारतीय ज्ञान परंपरा में किए जाने वाले छोटे-छोटे कार्य, छोटे-छोटे उत्सव हमारी उर्जा को बढ़ाकर हमारे शरीर को स्वस्थ्य रखने का कारक और हमारा स्वस्थ शरीर ईष्वर प्राप्ति का आधार है। लगातार ठंड से मंद हुई जठराग्नि पाचन शक्ति को कमजोर कर देती है। इसीलिए मकर सक्रंाति में खिचड़ी खाने की परंपरा है। साथ ही गर्माहट के लिए तिल और गुड़। इस विचार के साथ डाॅ. प्राची सिंह ने आज के उत्सव का अध्यात्मिक अर्थ प्रस्तुत किया।
डाॅ. सुदेष साहू ने इस प्रकृति महोत्सव पर आये हुये समस्त प्राध्यापकों डाॅ. दिव्या मिंज, डाॅ. अम्बरीष त्रिपाठी, डाॅ. राकेष तिवारी, श्री तरूण साहू , डाॅ. नीरू अग्रवाल, डाॅ. मौसमी डे, डाॅ. रचिता श्रीवास्तव, मोतीराम साहू , डाॅ. अभिषेक मिश्रा, डाॅ. प्रदीप जांगड़े आदि को संबोधित करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया कि आपकी उपस्थिति से विद्यार्थियों का उत्साह कई गुना बढ़ गया। इसी तरह के छोटे-छोटे सामाजिक, सांस्कृतिक महोत्सव विद्यार्थियों को उस त्यौहार के पीछे विज्ञान खोजने की नई समझ और अपने भविष्य के प्रति उत्साह जगायेंगे ऐसा विष्वास है। रंग बिरंगी पतंगों को उड़ते देखकर जीवन में एक नई उर्जा के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।

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