गुस्ताखी माफ : हिंसा से पश्चिम बंगाल का रिश्ता 100 साल भी पुराना
कोलकाता के जादवपुर इलाके में एक बीएलओ की हत्या हो गई। भाषणवीरों ने टीएमसी को कोसना शुरू कर दिया। कहा, टीएमसी के राज में कोई भी सुरक्षित नहीं है। यह भी कहा गया कि पश्चिम बंगाल जो कभी लोकतांत्रिक सोच और बौद्धिक परंपरा के लिए जाना जाता था, आज टीएमसी के शासन में डर, दबाव और राजनीतिक हिंसा का केंद्र बन गया है। उन्हें इतिहास की जानकारी नहीं है। आम-आदमी की स्मरण शक्ति को तो छोड़ ही दें। पश्चिम बंगाल का हिंसा से रिश्ता भी उतना ही पुराना है जितना कि स्वतंत्रता संग्राम का। बंगाल का एक विद्रोही 1905-06 में फ्रांस से बम बनाना सीखकर आया। पहला विस्फोट 1907 में ब्रिटिश ट्रेन में किया गया। इसके कुछ ही महीनों बाद मुजफ्फरपुर में एक बग्घी पर बम फेंका गया जिसमें दो अंग्रेज महिलाओं की जान चली गई। इस घटना ने खुदीराम बोस को किशोर विद्रोही, शहीद और पहले “स्वतंत्रता सेनानी’ के रूप में स्थापित कर दिया। 1908 में बाल गंगाधर तिलक ने लिखा कि बम केवल हथियार नहीं बल्कि एक नए प्रकार का “जादुई ज्ञान’ है जो बंगाल से शेष भारत में फैल रहा था। दरअसल, भारत का चौथा सबसे बड़ा राज्य पश्चिम बंगाल, जिसकी आबादी 10 करोड़ से अधिक है, लंबे समय से राजनीतिक हिंसा से जूझ रहा है। 1947 में आजादी मिलने के बाद दो दशकों तक कांग्रेस पार्टी, तीन दशकों तक कम्युनिस्ट नेतृत्व वाला वाम मोर्चा और 2011 से वर्तमान तृणमूल कांग्रेस यहां सत्ता में है। 1960 के दशक के उत्तरार्ध में यहां माओवादियों और सरकारी बलों के बीच सशस्त्र संघर्ष का लंबा इतिहास रहा है। सुतली से बने कच्चे बम, जिन्हें यहां “पेटो” कहा जाता है, का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों को चुप कराने के लिए होता रहा है। बंगाल का इतिहास रहा है कि यहां जनप्रतिरोध हमेशा हिंसक रहा है। किराया बढ़ने पर बसों में आगजनी, पाकेटमारों की पीट-पीट कर हत्या जैसे मामले 70-80 के दशकों में खूब सुनने में आते थे। ‘वन्देमातरम्’ खुद स्वयं 19वीं सदी के संन्यासी विद्रोह की उपज है। यह संन्यासी, फकीर, किसानों और जमींदारों का सशस्त्र आंदोलन ही था। थोड़ा इतिहास पढ़ें।
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