PCOS/PMOS से दुनिया भर में क़रीब 17 करोड़ से ज़्यादा महिलाएं प्रभावित

PCOS/PMOS से दुनिया भर में क़रीब 17 करोड़ से ज़्यादा महिलाएं प्रभावित

मई महीने में पीसीओएस यानी पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम का नाम बदलकर पीएमओएस यानी पॉलीएंडोक्राइन मेटाबोलिक ओवेरियन सिंड्रोम कर दिया गया। ऐसा करने में एक दशक का वक़्त लग गया। पीएमओएस दरअसल एक क्रोनिक फुल बॉडी हार्मोनल और मेटाबॉलिक डिसऑर्डर है, जिससे दुनिया भर में क़रीब 17 करोड़ से ज़्यादा महिलाएं प्रभावित हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का अनुमान बताता है कि इसकी चपेट में आने वाली क़रीब 70 फ़ीसदी महिलाएं इस बात से अनजान हैं, जो इन दिक्कतों को और गंभीर बनाती हैं। पीसीओएस का नाम बदलना इस बात पर ज़ोर देता है कि ये सिर्फ़ रिप्रोडक्शन या ओवेरी (अंडाशय का) तक ही सीमित नहीं है, बल्कि ये शरीर के कई सारे सिस्टम पर असर डालता है।

इसमें इंसुलिन रेसिस्टेंस का काफ़ी ख़तरा रहता है। मोटापा और टाइप 2 डायबिटीज़ का जोखिम भी बना रहता है। इसमें मासिक का अनियमित होना और एंड्रोजन लेवल बढ़ना शामिल है, जिससे एक्ने, चेहरे और शरीर पर बाल ज़्यादा आते हैं। एंजाइटी और डिप्रेशन का ख़तरा बढ़ता है। जिन मामलों को संभाला नहीं जाता, उनमें स्लीप एपनिया या अनिद्रा, प्रेग्नेंसी के समय होने वाली जेस्टेशनल डायबिटीज़ और एंडोमेट्रियल कैंसर जैसे समस्याएं हो सकती हैं।

पीएमओएस के लक्षणों के मुताबिक इसे कंट्रोल करने की कोशिश की जाती है। ये एक ऐसा सिंड्रोम है, जो हर महिला को अलग-अलग तरीके से प्रभावित करता है। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, साल 1993 तक महिलाओं को ज़्यादातर क्लीनिकल ट्रायल से बाहर रखा जाता था।

डब्ल्यूएचओ के मुताबिक पुरुषों की तुलना में महिलाएं ज़्यादा जीती हैं। एक महिला की औसत उम्र 73.8 साल और पुरुष की 68.4 साल होती है। लेकिन इसके बावजूद महिलाएं अपनी ज़िंदगी का 25 फ़ीसदी से ज़्यादा समय ख़राब सेहत के साथ बिताती हैं।

‘महिलाओं के पीएमएस, पीसीओएस और दूसरी प्रजनन स्वास्थ्य समस्याओं के डायग्नोसिस में देरी के पीछे की वजह बड़े सामाजिक ढांचे हैं। पितृसत्तात्मक व्यवस्था में महिलाओं की ज़रूरतों को हमेशा पुरुष और परिवार की ज़रूरतों के हिसाब से देखा गया। इसलिए इसमें इतनी देर हो गई।

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