डायबिटीज के लिए फूलप्रूफ नहीं है HbA1c टेस्ट, यह है खतरा
नई दिल्ली। भारतीय परिप्रेक्ष्य में अकेले HbA1c के भरोसे इलाज करना महंगा पड़ सकता है। यह बात एक समीक्षा में सामने आई है। इस एक टेस्ट के भरोसे इलाज करना ऐसे लोगों को जबरदस्ती डायबिटिक घोषित कर सकता है जिन्हें कोई समस्या नहींं , जबिक ऐसे लोग छूट सकते हैं जिन्हें वास्तव में टाइप-2 डायबिटीज है।
NDTV India में प्रकाशित खबर के अनुसार भारत में डायबिटीज आज एक आम लेकिन गंभीर स्वास्थ्य समस्या बन चुकी है। लाखों लोग हर साल ब्लड टेस्ट कराते हैं और सिर्फ एक रिपोर्ट के आधार पर दवाएं शुरू कर दी जाती हैं। इनमें सबसे ज्यादा भरोसा किया जाने वाला टेस्ट है HbA1c, जिसे पिछले 2-3 महीनों की औसत ब्लड शुगर बताने वाला मानक माना जाता है। लेकिन अब एक्सपर्ट्स की एक नई समीक्षा ने इस टेस्ट की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं खासकर भारतीयों के संदर्भ में।
प्रोफेसर अनूप मिश्रा और उनके सहयोगियों द्वारा की गई एक व्यापक समीक्षा (Review) में यह सामने आया है कि टाइप-2 डायबिटीज के डायग्नोस में केवल HbA1c टेस्ट पर निर्भर रहना कई बार गलत और जोखिम भरा साबित हो सकता है। यह खुलासा इसलिए भी अहम है, क्योंकि भारत जैसे देश में डायबिटीज का बोझ तेजी से बढ़ रहा है।
HbA1c टेस्ट यह मापता है कि पिछले कुछ महीनों में आपके खून में शुगर का लेवल औसतन कितना रहा है। आमतौर पर 6.5 प्रतिशत या उससे ज्यादा HbA1c को डायबिटीज माना जाता है। लेकिन, समस्या तब शुरू होती है, जब यह आंकड़ा हर शरीर पर एक जैसा लागू नहीं होता।
समीक्षा में बताया गया है कि दक्षिण एशियाई लोगों, खासकर भारतीयों में हीमोग्लोबिन की ग्लाइकेशन प्रक्रिया (यानि शुगर का हीमोग्लोबिन से जुड़ना) अन्य नस्लों से अलग हो सकती है। इसका मतलब यह हुआ कि कुछ लोगों में HbA1c बिना ज्यादा शुगर के भी ज्यादा आ सकता है। वहीं कुछ असली डायबिटिक मरीजों में HbA1c अपेक्षाकृत कम दिख सकता है। यही वजह है कि HbA1c के नतीजे कई बार भ्रमित करने वाले हो सकते हैं।
चेतावनी साफ है कि केवल HbA1c के आधार पर डायबिटीज का इलाज शुरू करना खतरनाक हो सकता है। इसके दो बड़े नुकसान हो सकते हैं। हेल्दी व्यक्ति को डायबिटिक घोषित कर देना, जिससे उसे बेवजह दवाएं और मानसिक तनाव झेलना पड़े। वास्तविक मरीज का डायग्नोस छूट जाना, जिससे बीमारी समय रहते पकड़ में नहीं आती और जटिलताएं बढ़ती हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि HbA1c को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता, लेकिन इसे अकेले निर्णायक टेस्ट नहीं बनाया जाना चाहिए। इसके साथ फास्टिंग ब्लड शुगर पोस्ट-प्रांडियल शुगर, ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट (OGTT) और मरीज के लक्षणों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
डायबिटीज का डायग्नोस सिर्फ एक नंबर नहीं, बल्कि पूरे व्यक्ति की स्थिति को देखकर होना चाहिए। भारत जैसे विविध जैविक बनावट वाले देश में वन-साइज-फिट्स-ऑल तरीका खतरनाक हो सकता है।
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