Mutant varieties of rice can revolutionise paddy production

धान की म्यूटेंट किस्में कृषि के क्षेत्र में ला सकती हैं क्रांतिकारी बदलाव

किसानों को कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित म्यूटेंट धान बीज के मिनी किट का वितरण

रायपुर। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर द्वारा भाभा अटामिक रिसर्च सेंटर ट्रॉम्बे (मुंबई) के सहयोग से विकसित धान की छह उन्नत म्यूटेंट किस्मों का कृषि महाविद्यालय रायपुर में आज आयोजित एक समारोह में प्र्गतिशील कृषकों को वितरण किया गया। धान की ये सभी म्यूटेंट किस्में परंपरागत प्रजातियों की अपेक्षा जल्दी पकती हैं, ज्यादा उपज देती हैं, कम ऊंची होती हैं और कीट-व्याधियों के प्रति अधिक सहनशील होती हैं। मिनी किट बीज वितरण समारोह की मुख्य अतिथि छत्तीसगढ़ शासन में कृषि उत्पादन आयुक्त श्रीमती शहला निगार थीं। कार्यक्रम की अध्यक्षता इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. गिरीश चंदेल ने की। समारोह में प्रदेश भर से आए प्रगतिशील किसानों को इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय द्वारा भाभा अटामिक रिसर्च सेंटर ट्रॉम्बे (मुंबई) के सहयोग से विकसित किस्मों-विक्रम ट्रॉम्बे छत्तीसगढ़ राईस (विक्रम टीसीआर), ट्रॉम्बे छत्तीसगढ़ विष्णुभोग म्यूटेंट, ट्रॉम्बे छत्तीसगढ़ सोनागाथी म्यूटेंट, ट्रॉम्बे छत्तीसगढ़ दुबराज म्यूटेंट-1, बौना लुचाई एवं ट्रॉम्बे छत्तीसगढ़ जवाफूल म्यूटेंट के मिनी किट का वितरण किया गया।
समारोह का संबोधित करते हुए कृषि उत्पादन आयुक्त श्रीमती शहला निगार ने कहा कि छत्तीसगढ़ का हीरा और सोना यहां का धान ही है। उन्होंने कहा कि वे देश के विभिन्न क्षेत्रों में पली-बढ़ीं, पढ़ी-लिखी तथा नौकरी में रही लेकिन उन्होंने छत्तीसगढ़ जैसा चांवल न कहीं देखा और न कहीं खाने को मिला। श्रीमती निगार ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा किसानों की आर्थिक समृद्धि के लिए चलाई जा रही विभिन्न विकास योजनाओं के निर्माण एवं क्रियान्वयन कृषि विश्वविद्यालय महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। कृषि विश्वविद्यालय द्वारा बार्क के सहयोग से विकसित धान की ये म्यूटेंट किस्में भी इस बात का परिचायक हैं। उन्होंने कहा कि रेडियेशन के माध्यम से विकसित फसलों की विभिन्न किस्में कृषि के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती हैं। कृषि उत्पादन आयुक्त ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा इस खरीफ वर्ष में धान की 40 प्रतिशत पुरानी किस्मों को नवीन उन्नत किस्मों से प्रतिस्थापित करने की योजना है जिसमें ये किस्में अहम योगदान दे सकती हैं। उन्होंने किसानां से परंपरागत फसलों की जगह अधिक मुनाफा देने वाली फसलें उगाने का आव्हान किया।
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. गिरीश चंदेल ने कहा कि इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विगत 10 वर्षों से भाभा अटामिक रिसर्च सेंटर ट्रॉम्बे (मुंबई) के सहयोग से म्यूटेशन ब्रीडिंग के माध्यम से विभिन्न फसलों की नवीन किस्में विकसित करने का कार्य किया जा रहा है। इस परियोजना के तहत छत्तीसगढ़ की परंपरागत किस्मों में म्यूटेशन के माध्यम से फसल सुधारने का कार्य किया जा रहा है। परियोजना के अंतर्गत अबतक धान की 7 म्यूटेंट किस्मों के साथ ही अन्य फसलों की नवीन उन्नत किस्में भी विकसित की गई हैं। म्यूटेशन ब्रीडिंग के माध्यम से विभिन्न किस्मों अवांछित गुण दूर करके वांछित गुणों का समावेश किया जा रहा है जिससे ज्यादा उपज, कम अवधि, कम उंचाई, कीट व्याधियों के प्रति सहनशील सूखा सहनशील अधिक पोषण देने वाली किस्में विकसित की गई हैं। उन्होंने कहा कि इससे छत्तीसगढ़ की परंपरागत किस्मों के दुर्लभ गुणों का किया जा सकेगा।
भाभा अटामिक रिसर्च सेंटर ट्रॉम्बे (मुंबई) के अपर संचालक प्रोफेसर पी.ए. हसन ने म्यूटेशन ब्रीडिंग की तकनीक तथा रेडियेशन के द्वारा विभिन्न फसलों में वांछित गुणों के समावेश के महत्व के बारे में जानकारी दी। भाभा अटामिक रिसर्च सेंटर ट्रॉम्बे (मुंबई) के नाभिकीय कृषि एवं जैव प्रौद्योगिकी विभाग के प्रमुख डॉ. ए.डी. बल्लाल ने भी किसानों को कृषि में नाभिकीय ऊर्जा के उपयोग के बारे जानकारी दी। कार्यक्रम के अंत में पादप प्रजनन विभाग के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. दीपक शर्मा ने अतिथियों के प्रति आभार प्रकट किया। इस अवसर पर कृषि महाविद्यालय रायपुर के अधिष्ठाता डॉ. आरती गुहे, संचालक अनुसंधान डॉ. वी.के. त्रिपाठी, निदेशक विस्तार सेवाएं डॉ. एस.एस. टूटेजा सहित विभिन्न विभागाध्यक्ष एवं प्रगतिशील किसान उपस्थित थे।

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