दूध उत्पादन में भारत अव्वल तो बीफ निर्यात में भी शीर्ष पर
भिलाई के युवाओं ने दिखाया डेयरी उद्योग का काला चेहरा
भिलाई। भारत जहाँ दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक है (सालाना 230 मिलियन टन से अधिक उत्पादन), वहीं यह बीफ के शीर्ष वैश्विक निर्यातकों में भी शामिल है, जो हर साल 1.3 मिलियन टन से अधिक मांस का निर्यात करता है। जिस डेयरी उद्योग से दूध आता है, वही भारत की बीफ सप्लाई चेन भी है। जो पशु “लाभकारी” नहीं रह जाते, उन्हें आगे बेच दिया जाता है, जहाँ वे नियमित सहित मांस अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन जाते हैं।दूध भारतीय जीवन का अभिन्न अंग है और पोषण व ग्रामीण आजीविका से गहराई से जुड़ा है। लेकिन डेयरी उद्योग का वह पहलू कम दिखाई देता है जिसमें जानवरों को बार-बार प्रजनन के लिए मजबूर किया जाता है, जन्म के तुरंत बाद बछड़ों को उनकी माँ से अलग कर दिया जाता है, और जब दूध का उत्पादन कम हो जाता है, तो उन्हें बेच दिया जाता है, लावारिस छोड़ दिया जाता है या कत्ल के लिए भेज दिया जाता है। यह कोई अपवाद नहीं बल्कि इस उद्योग का सामान्य नियम है।
शहरी क्षेत्रों में, घरों, बाजारों और हाईवे के पास लावारिस छोड़ी गई गायें और बैल अब आम दृश्य बन गए हैं। जबकि इसे अक्सर नगर निगम की समस्या मान लिया जाता है, पशु कार्यकर्ताओं का कहना है कि इनमें से अधिकांश जानवर पास की डेयरियों से ही आते हैं, जब वे आर्थिक रूप से “अनुपयोगी” हो जाते हैं। भिलाई की पशु कार्यकर्ता पलक राठौड़ ने कहा, “लोग इन गायों को रोज़ देखते हैं, लेकिन शायद ही कभी यह सवाल करते हैं कि वे यहाँ कैसे पहुँचीं। ये जानवर सड़क पर संयोग से नहीं हैं; ये उस डेयरी उद्योग का परिणाम हैं जो भैंसों और गायों को ‘इस्तेमाल करने के बाद उन्हें फेंकने योग्य ‘वस्तु’ समझ लेता है।”
इस प्रदर्शनी ने इस बात पर प्रकाश डाला कि दूध के साथ भारत का रिश्ता न तो दयालु है और न ही वध-मुक्त है। प्राणी प्रोटेक्शन फाउंडेशन की पशु बचावकर्ता प्रांजलि शुक्ला ने कहा, “छत्तीसगढ़ में भी, जहाँ भैंस वध अवैध है, कई जानवर अंततः बूचड़खानों में पहुँच जाते हैं। डेयरी उद्योग की वास्तविकता को समझने के लिए लोगों को यूट्यूब पर ‘माँ का दूध’ डॉक्यू मेंट्री देखनी चाहिए।”
गणतंत्र दिवस पर वडोदरा, लखनऊ और भिवानी में भी युवाओं ने इसी तरह के सार्वजनिक प्रदर्शन किए।
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