प्रेमियों का सहारा बना आर्यसमाज, 119 साल में 34 हजार शादियां

प्रेमियों का सहारा बना आर्यसमाज, 119 साल में 34 हजार शादियां

रायपुर। जिन प्रेमियों के लिए समाज में विवाह करना एक दुरूह कार्य होता है, आर्य समाज के मंदिर उनके लिए किसी वरदान से कम नहीं हैं। यहां प्राप्त आयु के विवाह योग्य जोड़े बिना धर्म या जाति बंधन के दाम्पत्य सूत्र में बंध सकते हैं। यहां से विवाह प्रमाणपत्र भी जारी किया जाता है और उसका बाकायदा रजिस्टर भी रखा जाता है। इस सर्टिफिकेट के आधार पर विवाह का पंजीयन भी कराया जा सकता।

एक ऐसी ही मंदिर छत्तीसगढ़ की राजधानी बैजनाथ पारा में भी है। दैनिक भास्कर एवं दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर के मुताबिक इस मंदिर की स्थापना 1907 में की गई थी। यहां अंतरजातीय विवाह कराए जाते हैं क्योंकि आर्य समाज जाति बंधन को नहीं मानता। यह हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 और आर्य समाज वैलिडेशन एक्ट, 1937 के तहत पूरी तरह मान्य है। मुख्य शर्त यह है कि दोनों पक्ष हिंदू, बौद्ध, सिख या जैन धर्म के अनुयायी हों।

इस मंदिर की स्थापना स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय ने की थी। उस समय रायपुर सेंट्रल प्रोविंसेस और बरार का हिस्सा था। बरार ब्रिटिश काल से पहले और दौरान एक ऐतिहासिक क्षेत्र का नाम था। यह आज के महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र जैसे अमरावती, अकोला, बुलढाणा आदि में आता था। आज यह मंदिर करीब 119 साल पुराना हो चुका है।

अंग्रेजों के दौर से लेकर अब तक यहां 34 हजार से ज्यादा प्रेमी जोड़ों की शादी हो चुकी है। इसकी पंजी आज भी यहां संरक्षित है। हर साल यहां 1000 से 1100 शादियां होती हैं। वैलेंटाइन डे के आसपास विवाह करने वाले जोड़ों की संख्या और बढ़ जाती हैं।

कई बार प्रेमी जोड़े घरवालों से छिपकर विवाह करने आते हैं। जैसे ही परिवार को जानकारी मिलती है, वे विरोध करने पहुंच जाते हैं। कई बार पुलिस की मौजूदगी में भी विवाह संपन्न कराया गया। मंदिर प्रबंधन का कहना है कि जोड़ा मंदिर की चौखट तक पहुंचता है, तो वैदिक रीति से विवाह कराने की पूरी कोशिश की जाती है।

आर्य समाज की स्थापना स्वामी दयानंद सरस्वती ने 1875 में की थी। यह संस्था जात-पात और भेदभाव को नकारते हुए अंतरजातीय विवाह और सामाजिक एकता को बढ़ावा देती है। यही वजह है कि यहां प्रेम विवाह करने वाले जोड़ों की संख्या लगातार बढ़ रही है।

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