चहल पहल और निर्माण से बिगड़ सकती है "ग्रीन केव" की पारिस्थितकी

चहल पहल और निर्माण से बिगड़ सकती है “ग्रीन केव” की पारिस्थितकी

जगदलपुर। कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान में हाल में मिली हरी गुफा (ग्रीन केव) में चल रहे निर्माण के खिलाफ पर्यावरणविदों ने बिलासपुर के उच्च न्यायालय में याचिका दायर की है। पर्यावरणविदों ने कहा कि गुफा के अंदर मौजूद स्टेलेक्टाइट्स पर शैवाल की परत जमी हुई है, जिससे यह बारीक हरे रंग की ऑइल पेंटिंग जैसी बनावट बनाती है। दीवारों व छत से लटकी चूना पत्थर की संरचनाओं पर मौजूद सूक्ष्म हरी माक्रोबियल परतों के कारण ये भूवैज्ञानिक दृष्टि से खास है।

दायर याचिका में कहा गया है कि ग्रीन केव बेहद संवेदनशील है, जहां धूल के साथ ही पर्यटकों की आवाजाही से गुफा की मूल पारिस्थितिकी को खासा नुकसान पहुंच सकता है। हालांकि हाईकोर्ट की तरफ से याचिका को पंजीकृत करने की कार्रवाई की जा रही है। इधर ग्रीन केव पर किसी भी तरह का निर्माण तत्काल रोकने की मांग भी याचिकाकर्ताओं ने की है।

गौरतलब है कि पर्यावरणविदों ने कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान में मिले दुर्लभ व पर्यावरण की दृष्टि से बेहद संवेदनशील ग्रीन केव को पर्यटकों के लिए खोलने के राज्य सरकार के फैसले का विरोध किया है। याचिका में पर्यावरणविदों ने कहा है कि इस तरह की गुफा पारिस्थितिकी दुनिया की सबसे नाजुक प्रणालियों में से एक होती है। ये बंद और स्थिर प्रणाली होती है, जो मामूली हस्तक्षेप से भी बड़े और स्थायी नुकसान का कारण बन सकता है।

पर्यटकों की आवाजाही से धूल, शोर, कंपन और आर्द्रता में बदलाव गुफा के पर्यावरण पर तात्कालिक और दीर्घकालिक दुष्प्रभाव डाल सकते हैं। इसलिए काम को तत्काल पूरी तरह से रोक देना चाहिए। कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान में मिली 27 में से यही एकमात्र ऐसी गुफा है, जहां दोपहर को केवल एक घंटे के लिए ही सूर्य की रोशनी पहुंचती है। गुफा के अंदर मौजूद स्टेलेक्टाइट्स पर शैवाल की परत जमी हुई है, जिससे यह बारीक हरे रंग की ऑइल पेंटिंग जैसी बनावट बनाती है।

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