मणिकर्णिका घाट की भस्म होली का शास्त्रीय आधार नहीं
वाराणसी। उत्तर प्रदेश के वाराणसी के मणिकर्णिका घाट और हरिश्चन्द्र घाट पर होने वाली चिता भस्म होली ( मसान होली ) का कोई शास्त्रीय आधार नहीं है। ये कोई प्राचीन परम्परा भी नहीं है। चंद रुपयों की खातिर इसे अवसरवादियों ने शुरू किया और मीडिया हाइप के चलते इसकी ख्याति दूर दूर तक फैल गई। पहले काशी विद्वत परिषद और केन्द्रीय ब्राह्मण महासभा ने ऐसा दावा किया है।
केंद्रीय ब्राह्मण महासभा के प्रदेश अध्यक्ष अजय शर्मा ने दावा किया है कि 2014 में इस गलत परम्परा की शुरुआत की गई थी। तब उनके अघोरियो को ठंडाई पिलाने के नाम पर 2000 रुपए मांगे गए थे। उन्होंने दे भी दिये थे। इसके बाद 2015 में भी आयोजक गुलशन कपूर ने 3500 रुपये मणिकर्णिका घाट पर औघड़, साधु और तांत्रिकों को ठंडाई पिलाने के लिए मांगी थी।
लेकिन एक तस्वीर ने इस ठंडाई पिलाने की शुरुआत ने आयोजकों को पैसे कमाने का रास्ता दिखा दिया और पैसे कमाने की लालच में महाश्मशान भूमि पर एक गलत और अशास्त्रीय परम्परा शुरू कर दी।
केंद्रीय ब्राह्मण महासभा के प्रदेश अध्यक्ष अजय शर्मा भी अब काशी विद्वत परिषद के साथ मणिकर्णिका घाट और हरिश्चन्द्र घाट पर होने वाली मसान होली को अशास्त्रीय बता दिया है। इतना ही नहीं अजय शर्मा ने बताया कि ये परंपरा जिसे प्राचीन बताया जा रहा है, वो प्राचीन नहीं, बल्कि 2014 में शुरू हुई है।
अजय शर्मा ने बताया कि 2015 में एक बनारस के फोटोग्राफर मनीष खत्री ने 2015 में मणिकर्णिका घाट पर गुलशन कपूर और कुछ साधुओं की तस्वीरें मीडिया के माध्यम से पब्लिश कराई। जिसके बाद ये चर्चा होने लगी कि ये प्राचीन परंपरा है। 2009 में स्वर्गीय पंडित छन्नू लाल मिश्रा जी का गाना “खेले दिगंबर मसाने में होली” गाना का रिकार्डेड वर्जन सामने आया था। 2015 के बाद 2017 और 2018 में यूट्यूब पर भी ये गाना सामने आ गया। इस बीच सोशल मीडिया के सैकड़ों इंफ्लूएंसर भी 2021 में काशी विश्वनाथ कॉरिडोर बनने के बाद यहां पहुंचने लगे।
अब इसी प्रचार के आधार पर आयोजकों ने इस 2014 से शुरू हुई परम्परा को प्राचीन बता कर मार्केटिंग शुरू करके खूब पैसे बनाना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे जानकारी के अभाव में लोगों की भीड़ बढ़ती गई और अब ये इतना विकृत रूप ले चुका है कि अगर अभी रोक न लगाई गई तो ये विकृति बढ़ती जाएगी।
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