कम बीज, थोड़ा पानी, “श्री विधि” से खेती ने बदली रागी की कहानी
दंतेवाड़ा। कृषि कार्यों को लाभकारी बनाने के लिए दो उपाय किये जा सकते हैं। श्री विधि ने ठीक यही किया है। मोटा अनाज रागी की फसल लेने के लिए ऐसी तकनीक उपलब्ध कराई है जिसमें न केवल प्रति एकड़ लगने वाले बीज की मात्रा लगभग आधी हो गई है बल्कि पानी की जरूरत भी बहुत कम पड़ती है। जैविक खाद के उपयोग ने सोने पर सुहागा कर दिया है।
दंतेवाड़ा जिले के कृषि इतिहास में पहली बार लगभग 300 प्रगतिशील किसानों ने उन्नत ‘श्री विधि’ से रागी (मडिया) की बुवाई और खेती शुरू की है। रागी को पोषण के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसमें कैल्शियम और आयरन की प्रचुर मात्रा पाई जाती है। दंतेवाड़ा जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्र में यह पहल किसानों के लिए आर्थिक और पोषण दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
कृषि विभाग और भूमगादी की टीम गांव-गांव पहुंचकर किसानों को तकनीकी प्रशिक्षण और मार्गदर्शन दे रही है। किसानों को बुवाई की वैज्ञानिक विधि, पौधों के बीच उचित दूरी बनाए रखने, जैविक खाद के उपयोग और फसल प्रबंधन से जुड़ी जानकारी दी जा रही है। इससे किसानों में आधुनिक तकनीकों को अपनाने के प्रति उत्साह भी बढ़ रहा है। ‘श्री विधि’ से रागी की खेती कई मायनों में खास मानी जाती है। इस पद्धति में बीज की मात्रा कम लगती है, जिससे लागत घटती है। साथ ही पारंपरिक खेती की तुलना में पानी की आवश्यकता भी कम होती है, जो वर्षा आधारित क्षेत्रों के लिए काफी उपयोगी है। पौधों को पर्याप्त जगह मिलने से उनका विकास बेहतर होता है और इससे उत्पादन बढ़ने की संभावना भी रहती है।
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