पहाड़ों पर लगातार हो रही मामूली बारिश भी ला सकती है तबाही

पहाड़ों पर लगातार हो रही मामूली बारिश भी ला सकती है तबाही

देहरादून। बादल फटना या तेज मूसलाधार बारिश ही आपदा का एकमात्र कारण नहीं है। मामूली बारिश भी यदि लगातार हो तो भूस्खलन हो सकता है, सैलाब आ सकता है। दून विश्वविद्यालय ने देश के छह अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर यह शोध किया है। अध्ययन के मुताबिक, अगर पहाड़ी क्षेत्रों में 15 से 30 दिनों तक रोजाना औसतन 6 से 7 मिलीमीटर वर्षा होती रहे, तो ढलानों पर जमा मलबा पानी सोखकर अत्यधिक भारी और अस्थिर हो जाता है।

पहाड़ों पर लगातार हो रही मामूली बारिश भी ला सकती है तबाही

उत्तराखंड में औसतन हर वर्ष करीब 1900 से अधिक आपदाएं दर्ज की जाती हैं। वर्ष 2025 में यह संख्या बढ़कर लगभग 2100 से अधिक हो गई। इन घटनाओं में 263 लोगों की जान चली गई। आंकड़े संकेत देते हैं कि आपदाएं अब असामान्य नहीं रहीं, बल्कि एक नियमित और बढ़ती हुई चुनौती बन चुकी हैं।

दून विश्वविद्यालय के भूगर्भ विज्ञान विभाग के एचओडी डॉ. विपिन कुमार ने बताया कि यह अध्ययन कई संस्थानों ने मिलकर किया है और इसके निष्कर्ष बेहद महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने कहा कि जिन पहाड़ी नालों को स्थानीय भाषा में ‘गदेरे’ कहा जाता है, उनमें वर्षों से मलबा जमा होता रहता है। यह प्रक्रिया धीमी जरूर है, लेकिन लगातार चलती रहती है।

वैज्ञानिक शोधकर्ताओं का कहना है कि पानी से संतृप्त मलबा लगभग 60 किलोपास्कल का दबाव बनाते हुए अचानक खिसक सकता है। इसकी रफ्तार 10 किलोमीटर प्रति सेकेंड तक दर्ज की गई है, जो नीचे बसे गांवों और बस्तियों के लिए गंभीर खतरा बन सकती है।

बीते साल 5 अगस्त को धराली में आई आपदा इसका हालिया और भयावह उदाहरण है। यह पूरे एक महीने की लगातार बारिश का परिणाम थी। पांच जुलाई से पांच अगस्त के बीच इस क्षेत्र में 195 मिमी बारिश दर्ज की गई। धीरे-धीरे हुई इस वर्षा ने पहाड़ियों पर जमा मलबे को पानी से भर दिया। बाद में जब यह मलबा खीरगंगा के बहाव के साथ नीचे आया, तो उसने भारी तबाही मचा दी।

शोध में स्पष्ट किया गया है कि 5 अगस्त को कोई अत्यधिक बारिश दर्ज नहीं हुई थी। असली कारण पिछले 30 दिनों में हुई लगभग 195 मिमी संचयी वर्षा थी। शुरुआती 3 दिन में 29 मिमी वर्षा हुई थी जबकि इसके बाद 7 दिन में 59 मिमी, 15 दिन में 94 मिमी और अंतिम दिन तक 195 मिमी वर्षा हुई थी। लगातार वर्षा ने ग्लेशियर और भूस्खलन से जमा ढीले मलबे को पूरी तरह संतृप्त कर दिया, जिससे अचानक मलबा सैलाब आया।

शोध रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि राज्य की प्रमुख नदियों, ग्लेशियरों के मुहानों, नाले-धारों और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में जमा मलबे की मैपिंग की जाए। सेडिमेंट सोर्स मैपिंग को जरूरी बनाया जाए ताकि मलबे के स्रोतों की निरंतर पहचान और निगरानी हो सके। साथ ही वैज्ञानिकों ने सरकार की आपदा प्रबंधन नीतियों में क्वांटिटेटिव हैजार्ड साइंस को शामिल करने की सिफारिश की है, जिससे जोखिम का वैज्ञानिक आकलन कर समय रहते प्रभावी रिजल्ट लिए जा सकें।

#UttarakhandLandslides #Drizzle-to-Disaster

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