16th Century Ganesh Temple at Dhamtari

16वीं सदी का गणेश मंदिर, यहां साथ रहते हैं सांप और मेंढक

धमतरी। नगरी ब्लॉक मुख्यालय से 18 किमी दूर गढ़डोंगरी गांव में स्वयंभू श्रीगणेश की चतुर्भुज प्रतिमा है। इसकी ख्याति दूर तक फैली है। यहां गणेश चतुर्थी पर ज्योत जलाई जाती है। ग्रामीणों के मुताबिक, भगवान श्रीगणेश की यह प्रतिमा 16वीं सदी की है। प्रतिमा से कुछ दूर आम का एक पेड़ है। यहां बिल के अंदर सांप और मेंढ़क एक साथ रहते हैं। सांप ने कभी भी मेंढक को नुकसान नहीं पहुंचाया है। प्रतिमा के पास एक जलधारा है, जो भगवान के चरण से होकर कुंड में जाती है। कुंड के जल को लोग गंगाजल मानते हैं। मंदिर ट्रस्ट अध्यक्ष छेदूराम कौशिल, मोहन सोनवानी ने बताया, मान्यता है कि 16वीं सदी के मालगुजार ठाकुर वनसिंह जंगल में शिकार करने गए थे। वन्य प्राणियों का पीछा करते हुए उनका पांव नुकीले पत्थर से टकराया। वे जख्मी हो गए। खून बहने लगा। पत्थर को रास्ते से हटाने का प्रयास किया, लेकिन नहीं हटा।
वह थककर घर लौट आए। सोते समय सपने में गणेशजी आए और कहा कि जिस पत्थर से तुम जख्मी हुए हो, उसमें मेरा वास है। सुबह मालगुजार ने यह बात ग्रामीणों को बताई। फिर इसी जगह मंदिर का निर्माण कराया। मालगुजार इसी मूर्ति से टकराया था। ग्रामीणों के अनुसार मंदिर का वर्तमान स्वरूप समिति ने साल 1991 में बनवाया है। पहले भगवान गणेश पेड़ के नीचे बैठे थे। बैठने के लिए झोपड़ीनुमा बरामदा बनाया गया था। सामुदायिक भवन का निर्माण जनसहयोग से हुआ। ज्योति कक्षा का निर्माण भी कराया गया है। गढ़डोंगरी अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है। यहां पर स्थित पहाड़ी अपने में हरियाली को समेटे हुए है। पहाड़ में स्थित गुफाएं पौराणिक गाथाओं को समेटे हुए है। शोधकर्ताओं को अपनी ओर आकर्षित करने की क्षमता रखती है।

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