कौन हैं मावली माता, चक्रकोट से क्या है इनका रिश्ता?
नारायणपुर। नारायणपुर या यूं कहें कि बस्तर का मावली मेला आज से प्रारंभ हो रहा है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय इसमें शामिल होने के लिए पहुंचे हुए हैं। मावली मेला का एक प्राचीन इतिहास है जो यहां के आदिवासी समुदाय की मान्यताओं से भी जुड़ा है। इस मेले में अबूझमाड़िया, मुरिया और हल्बा जनजातियों की प्राचीन संस्कृति की झलक दिखाई देती है। आखिर कौन हैं मावली माता और चक्रकोट से इनका रिश्ता क्या है?

प्राचीन काल में बस्तर के तत्कालीन राजा अन्नमदेव के दौरान पूर्व बस्तर रियासत को चक्रकोट के नाम से जाना जाता था। चक्रकोट की आराध्य देवी माता मावली हुआ करती थी। माता को मणिकेश्वरी नाम से भी जाना जाता था। इसीका संक्षिप्त नाम मावली माता है। मावली शब्द संस्कृत के मौली धातु से आया है. जिसका शाब्दिक अर्थ मूल में होता है।

मावली माता (या माउली माता) आदिवासी समाज, विशेषकर बस्तर और नारायणपुर अंचल की प्रमुख कुलदेवी और आराध्य देवी हैं। इन्हें वनदेवी के रूप में पूजा जाता है। ये ऐतिहासिक मावली मेले (जात्रा) की मुख्य अधिष्ठात्री देवी हैं। जिन्हें आदिवासी अपनी रक्षा करने वाली माता के रूप में मानते हैं। बलौदाबाज़ार जिले के सिंगारपुर में माता का प्रसिद्ध 400 साल पुराना मंदिर है, जहाँ इन्हें त्रिदेवों (शिव, ब्रह्मा, विष्णु) द्वारा प्रकट की गई देवी माना जाता है। पूजा में गोड़ पुजारियों की वंशावली का विशेष महत्व है।

नारायणपुर में आयोजित होने वाले प्रसिद्ध ‘मावली मेला’ में विभिन्न गांवों से आदिवासी अपने कुल देवी-देवताओं को लकड़ी की पालकियों में लाते हैं और माता मावली के सम्मान में पूजा-अर्चना व जात्रा करते हैं। मेले के प्रथम दिवस स्थानीय देवी-देवताओं के प्रतीक स्वरूप डंगई, लाठ, डोली और छत्र के साथ भव्य जुलूस के रूप में मेला स्थल पर एकत्र होते हैं। मेला स्थल पर पहुंचकर ढाई परिक्रमा की रस्म पूरी की जाती है।
मेला स्थल पर माता मावली, कोट गुड़ीन, शीतला माता, कोकोड़ी करीन, तेलवाड़ीन माता, कंकालीन माता, सोनकुंवर, भीमादेव सहित कई स्थानीय देवी-देवताओं का भव्य स्वागत किया जाता है। सिरहा, पुजारियों और गायता (पारंपरिक पुजारी वर्ग) के साथ मिलकर अनुष्ठान किये जाते हैं।
नारायणपुर क्षेत्र में अबूझमाड़िया, मुरिया और हल्बा जनजाति के लोग निवास करते हैं। माता मावली इन जनजातियों की ईष्ट देवी हैं। नारायणपुर के दक्षिण पश्चिम में करगाल परगना है। इसी के अंतर्गत यहां मड़ई लगती है। करगाल के दक्षिण में बडदाल परगना है जो बहुत ही दुर्गम क्षेत्र है। नारायणपुर के उत्तर में दुगाल परगना और इसके बाद कोलोर परगना के कुछ गांव हैं। इसके अलावा गढ़चिरौली तक जेटिन परगना के गांव आते हैं। नारायणपुर के उत्तर पूर्व में 12 जोड़ीयान परगना हैं। पूर्व में बेनूर परगना, दक्षिण पूर्व में छोटेडोंगर और इसके बाद के सभी गांव ओरछा परगना के अंतर्गत आते हैं।
जब सभी परगना से आदिवासी समाज के लोग जुटते हैं तो मड़ई मेले की शुरुआत होती है। मावली मड़ई मेले में गढ़िया बाबा सांकर देव सब देवताओं के आगे चलते हैं। सांकर देव के आगमन तक सभी देवता उनकी प्रतीक्षा करते हैं।
दशहरा पर्व के दौरान भी विश्व प्रसिद्ध मावली मड़ई में बस्तर के संपूर्ण क्षेत्र का आदिवासी समाज जुटता है. सभी मेले आदिवासी समाज को समझने का माध्यम होते हैं. यही वजह है कि इन मेलों में कई शोधार्थी भी पहुंचते हैं. बस्तर मेले में कई परगना से लोग पहुंचते हैं। प्रत्येक परगना में लगभग तीस से चालीस गांव आते हैं।












