गुस्ताखी माफ: अब सिर्फ चाइनीज मांझा, हम बनाना भूल गए
जब हम छोटे थे तब एक सांकल धागा आता था। शायद एक या दो रुपए की रील आती थी। इतने पैसे भी पास नहीं होते थे। इसलिए जब कोई सांकल छाप धागा खरीदकर लाता था तो हमारे कलेजे में छाले पड़ जाते थे। सांकल छाप धागे की जरूरत पतंग उड़ाने के लिए होती थी। यह धागा सांकल की तरह ही मजबूत होता था। वह पतंग लड़ाने का जमाना था। इसलिए इसे और मजबूत और घातक बनाना भी जरूरी होता था। ठीक उसी तरह जैसे लट्टू की कील (गुच) को बदलकर मोटी कील डाली जाती थी और उसे किसी हथियार की तरह पैना किया जाता था। पतंग उड़ाने की डोर को धार देने के लिए कांच के चूरे का इस्तेमाल किय जाता था। पुराने फ्यूज बल्ब और ट्यूबलाइट को फोड़कर उसे सिल बट्टे पर महीन पीसा जाता। इसे चावल के माड़ या साबूदाने में मिलाकर बाइंडर तैयार किया जाता। इसके बाद इसे धागे पर चढ़ाया जाता। पतंग लड़ाई में यह मांझा बहुत काम आता था। कभी कभार इससे लोग घायल भी हो जाते थे। खासकर साइकिल सवार जो बिना डोर को देखे आगे बढ़ जाते थे। कभी-कभी बनाने वाला भी घायल हो जाता। उन दिनों बच्चे अपनी पतंग भी खुद ही बनाया करते थे। स्किल डेवलपमेंट का ऐसा अभ्यास अब नहीं देखने को मिलता। भिलाई शहर में खुली जगह की कमी नहीं थी। बावजूद इसके सड़कों पर भी लोग पतंग उड़ाया करते थे। कटी हुई पतंग को लूटने के लिए भी बच्चे झाड़ी-कांटे को अंधों तरह फांदते हुए भागते थे। गिरते पड़ते भी थे। घुटने छिल जाते थे। पर क्या मजाल जो किसी के आंसू निकले हों। पर वह दौर बीत गया। अब लोग पतंग भी उड़ाते हैं तो क्रियाकर्म की तरह। मकरसंक्रांति पर ही पतंग उड़ाई जाती है। भिलाई सहित देश भर में इसके बड़े आयोजन भी होते हैं। लोग एक मैदान में इकट्ठा होकर थोड़ी देर के लिए पतंग उड़ाते हैं। झिल्ली प्लास्टिक के पतंग खरीदे जाते हैं। डोर भी खरीदकर ले आते हैं। बाजार में जो सस्ता होता है, वही बिकता है। इस मामले में चीन का मुकाबला कौन करे?
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