बिहार में शराब बंदी की बात यानी बिढ़नी के खोते में हाथ

बिहार में शराब बंदी की बात यानी बिढ़नी के खोते में हाथ

पटना। बिहार में पूर्ण शराबबंदी की बात यानी “बिढ़नी के खोते में हाथ”। शराब बंदी के साइड इफेक्ट्स ने यहां सरकार की नींद उड़ा दी है। लगता है कि होली से पहले ही सरकार को इसमें अपने पांव पीछे करने पड़ेंगे। शराब बंदी के बाद जहरीली शराब से मौतें, शराब तस्करी के तेजी से बढ़े मामले और सरकार को हो रही राजस्व की जबरदस्त हानि ने पूरा खेल बिगाड़ कर रख दिया है।

बिहार में 2016 से लागू पूर्ण शराबबंदी अब बड़े सवालों के घेरे में है। एनडीए के घटक दल जीतन राम मांझी और अब उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी (RLM) ने इस कानून की व्यापक समीक्षा की मांग कर दी है। जहरीली शराब से मौतें, राजस्व का भारी नुकसान और तस्करी के बढ़ते मामलों ने सरकार पर दबाव बढ़ा दिया है।
बिहार में शराबबंदी मामला बिढ़नी (बिरनी) का खोता बन गया है। इसमें हाथ डाले नहीं कि भनभनाने का आवाज आनी शुरू हो जाती है। सत्ता और विपक्ष दोनों ओर से जुबान तीखी हो जाती है। बिहार में करीब एक दशक से लागू पूर्ण शराबबंदी कानून को लेकर राज्य की राजनीति में अब नया मोड़ आ गया है।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस ‘ऐतिहासिक निर्णय’ पर अब उनके अपने ही सहयोगी दलों ने सवाल उठाना शुरू कर दिया है। एक तरफ नीतीश कुमार इसे सामाजिक सुधार और महिला सुरक्षा का आधार बताते हैं, वहीं विपक्षी दलों के साथ-साथ अब सत्ता पक्ष के नेता भी इसे ‘विफल कानून’ करार देकर इसके आर्थिक और सामाजिक पहलुओं पर बहस छेड़ चुके हैं।

बिहार में शराबबंदी के 10 साल
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, कानून लागू होने के शुरुआती दो-तीन वर्षों में घरेलू हिंसा और महिला उत्पीड़न के मामलों में 12 से 18% की गिरावट देखी गई थी। महिला हेल्पलाइन पर आने वाली शिकायतों में कमी ने इस कानून को महिलाओं के बीच काफी लोकप्रिय बनाया, जो आज भी नीतीश कुमार का सबसे मजबूत वोट बैंक है। हालांकि, 10 साल बाद अब सवाल ये उठ रहा है कि क्या यह लाभ स्थायी रहा या केवल शुरुआती दौर तक सीमित था?
पर आर्थिक मोर्चे पर शराबबंदी बिहार के लिए बड़ी चुनौती साबित हुई है। वर्ष 2015-16 में शराब की बिक्री से राज्य सरकार को करीब 4500 करोड़ का उत्पाद शुल्क (Excise Duty) मिलता था, जो अब शून्य हो चुका है। अवैध तस्करी के कारण इस कानून की समीक्षा अनिवार्य है। वर्तमान में बिहार की सीमाओं पर कुल 67 चेक पोस्ट और सीसीटीवी की निगरानी के बावजूद तस्करी बेखौफ जारी है।

सदन में मंत्री अशोक चौधरी की ओर से पेश किए गए आंकड़ों ने सबको चौंका दिया है। 2016 से अब तक शराबबंदी के तहत करीब 10 लाख केस दर्ज हुए हैं और 16 लाख से अधिक लोगों की गिरफ्तारी की गई है। इसके बावजूद जहरीली शराब से होने वाली मौतें (जैसे छपरा कांड) रुक नहीं रही हैं। जानकारों का कहना है कि जब शराब कानूनी रूप से बिकती थी, तब जहरीली शराब की घटनाएं बहुत कम थीं। अब माफियाओं के वर्चस्व और अवैध निर्माण ने आम जनता की जान को खतरे में डाल दिया है।

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