पलक झपकते कसाई में तब्दील हो रहा हंसता बोलता आदमी
भिलाई। विक्रम राय और सुनील राय लिंक रोड से गुजर रहे थे। तभी एक युवक खतरनाक ढंग से बाइक चलाता हुआ उनके करीब से गुजरा। विक्रम ने उसे टोका और सुरक्षित ढंग से गाड़ी चलाने के लिए कहा। बस, फिर क्या था, युवक ने बाइक रोककर विक्रम और सुनील को पीटना शुरू कर दिया। उसके दोस्त भी आ गए उन लोगों ने विक्रम को इतना मारा कि उसकी मौत हो गई। सुनील को भी चोटें आई हैं। पलक झपकते लोग आखिर इतने हिंसक क्यों हो जाते हैं?समाजशास्त्रियों और मनोवैज्ञानिकों की इसे लेकर अलग अलग धारणाएं हैं। समाजशास्त्री जहां इसके लिए परिवार और दरकन को जिम्मेदार मानते हैं वहीं मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि लोगों की बर्दाश्त करने की क्षमता कम होती जा रही है। दोनों ही अपनी अपनी जगह सही हो सकते हैं पर हल किसी के पास नहीं है।
हिंसक होने की बात करें तो भारत में अकेले वर्ष 2025 में 27,300 लोगों की हत्या कर दी गई। हत्या करने वाले सगे संबंधी या परिचित ही थे। किसी ने बाप को मार दिया तो किसी ने मां का काट डाला। किसी ने बहन का गला दबा दिया तो किसी ने पति को जहर देकर उसके टुकड़े टुकड़े कर दिए। किसी ने पत्नी की हत्या कर दी तो किसी ने अवैध संबंध के शक में पति या पत्नी की हत्या कर दी।
पलक झपकते कसाई में तब्दील होते लोग
लोगों का कसाईपना भी इस बीच सामने आया है। वर्ष 2025 की ही बात करें तो 27 दिसम्बर को यूपी के गाजियाबाद में रहने वाले अजय गुप्ता और उसकी पत्नी आकृति ने मिलकर मकान मालकिन दीपशिखा की हत्या कर दी। इसके बाद लाश के टुकड़े कर उसे सूटकेस में भरकर ठिकाने लगाने जा ही रहे थे कि पकड़ लिए गए।
मार्च, 2025 में मेरठ के रहने वाले सौरभ राजपूत की हत्या उसकी पत्नी मुस्कान ने अपने प्रेमी साहिल के साथ मिलकर कर दी। दोनों ने शव के 20 टुकड़े किए और ड्रम में डालकर ऊपर से सीमेंट भर दिया।
दिल्ली में मई 2022 में हुआ श्रद्धा वालकर की हत्या लिव इन पार्टनर आफताब अमीन पूनावाला ने कर दी। लाश के टुकड़े किए और उन्हें धोकर पालीथीन में पैक कर जंगल में अलग-अलग बिखेर दिया।
इसी तरह तेलंगाना में सेना से रिटायर्ड गुरुमूर्ति ने पत्नी माधवी की हत्या कर दी। लाश के टुकड़े किए और प्रेशर कुकर में उबालकर झील में फेंक दिए।
इनमें से किसी का भी कोई आपराधिक रिकार्ड नहीं था। पलक झपकते ही ये कसाई में तब्दील हो गए। लाश को ठिकाने लगाने का यही एक तरीका उन्हें सूझा। क्षणिक आवेश में हत्या करने के बाद अपनी जान बचाने की फिक्र हुई तो लोग कसाई बन गए। शव को किसी भी कीमत पर ठिकाने जो लगाना था। इस तरह की हत्या और वीभत्सता को अंजाम देने वाले कोई अपराधी या गैंगस्टर नहीं, बल्कि आम लोग हैं।
समाज शास्त्रियों की मानें तो व्यक्ति अपने परिवार के माहौल से ही सहचर्य सीखता है। यहीं से उसके भीतर संवेदनाएं जागती हैं और वह इंसान बनता है। परिवार से कटे हुए लोगों में मनुष्यता कम होती है। ऊपर से जमाना उन्हें प्रतिस्पर्धी और स्वार्थी बनने की सीख दे रहा है। लोग एक दूसरे को धक्का देकर आगे निकल जाना चाहते हैं। कोई किसी के लिए पल भर रुकना नहीं चाहता। किसी की बात बर्दाश्त नहीं होती तो वह किसी भी हद तक जा सकता है। जान ले भी सकता है और जान दे भी सकता है।
क्रूरता पर स्टडी का निष्कर्ष
2012 में फिनलैंड की रिसर्चर्स हेलिना और एइला ने ‘जर्नल ऑफ फोरेंसिक साइंसेज’ के नाम से रिसर्च पेपर पब्लिश किया था। इसमें डेडबॉडी को काटने या टुकड़े करने के पीछे 5 मकसद बताए गए। पहला मकसद यह होता है कि अपराधी खुद को बचाने के लिए उतावला होता है। वह लाश के टुकड़े इसलिए करता है ताकि उसे आसानी से पैक किया जा सके और दूर कहीं ठिकाने लगाया जा सके। दूसरी वजह यह हो सकती है कि मृतक से हत्यारे को इतनी नफरत हो कि उसकी जान लेने मात्र से उसका गुस्सा शांत नहीं होता। यौन कुंठा से उपजी विकृति भी इसका एक कारण हो सकती है। मानसिक रूप से विक्षिप्त व्यक्ति कुछ भी कर सकता है। पांचवा कारण कुछ लोगों तक यह संदेश पहुंचाना हो सकता है कि बात नहीं मानी तो उनका भी यह हश्र हो सकता है।
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