धमधा के माटी शिल्पकार विष्णु ताम्रकार, असली नकली का फर्क करना मुश्किल
भिलाई/धमधा। 1960 के दशक तक जन्म लेने वाले बच्चों का बचपन मिट्टी के संस्पर्श में बीतता था। मिट्टी में लोटने से लेकर खोखो-कबड्डी और चिका जैसे खेल तो खेलते ही थे। गर्मियों में किसी पेड़ की छांव में बैठकर मिट्टी के खिलौने भी बनाया करते थे। विष्णु का बचपन भी कुछ ऐसे ही बीता पर मिट्टी से उनका लगाव कभी खत्म नहीं हुआ। एक शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएं देने के साथ ही उसने अपने शौक को जीवित रखा और बन गया एक ऐसा कलाकार जिसकी कृतियां अचंभित करती हैं।

हम बात कर रहे हैं धमधा के अवकाश प्राप्त शिक्षक विष्णु प्रसाद ताम्रकार की। उनके घर का प्रथम तल एक संग्राहलय है। यहां देश के कई प्रमुख महानुभावों की मूर्तियां तो हैं ही, साथ ही है फल और सब्जियों के रैक। एकदम असली जैसे दिखने वाले ये फल और सब्जियां मिट्टी की बनी हैं जिन्हें बड़ी खूबसूरती से रंगा गया है। दीवारों पर मिट्टी से खेलते बच्चों की तस्वीरें भी सजी हुई हैं।

इसे देखने का सौभाग्य हमें भारतीय राष्ट्रीय कला एवं सांस्कृतिक विरासत ट्रस्ट (INTACH) के हेरिटेज वॉक के दौरान मिला। INTACH की टोली रविवार को धमधा धर्मधाम गौरव गाथा समिति द्वारा आयोजित पुरखौती विरासत भ्रमण में शामिल हुई। पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो एसके पाण्डे, इंदिरा गांधी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. एसके पाटिल एवं पूर्व सदस्य सचिव राष्ट्रीय साक्षरता मिशन प्रो. डीएन शर्मा के नेतृत्व में यह भ्रमण कार्यक्रम संपन्न हुआ। धमधा में यह आयोजन धर्मधाम गौरव गाधा समिति के संयोजक गोविन्द पटेल के सौजन्य से सम्पन्न हुआ।

धमधा के छह आगर, छह कोरी तालाबों का इतिहास देखने के बाद हम पहुंचे विष्णु ताम्रकार के निवास पर। घर में प्रवेश करते ही शीतलता का अहसास हुआ। यहां हमारी मुलाकात ताम्रकार परिवार से हुई। पूरा परिवार इस दल के आवभगत में जुट गया। पर हम कुछ साथी प्रथम तल पर उनका संग्रहालय देखने पहुंच गए। यहां रखी मूर्तियों के साथ फोटो खिंचवाए, मिट्टी के फल और सब्जियों को हाथ में लेकर देखा और अचंभित होते रहे।

विष्णु ताम्रकार का कहना है कि वो बचपन से ही मूर्ति बनाने का शौक रखते हैं। उसके बाद उनकी नौकरी लग गई। नौकरी के दौरान उन्हें मूर्ति बनाने का समय नहीं मिल पाता था लेकिन अब रिटायरमेंट के बाद भरपूर समय मिलता है। इस समय का इस्तेमाल वो अपने हुनर को आकार देने में लगाते हैं। इसमें फल, पक्षी और राजनेताओं की मूर्तियां शामिल हैं। वे चाहते हैं कि सरकार मूर्ति कला को प्रोत्साहित करे और धमधा में म्यूजियम बनवाएं।
विष्णु बताते हैं कि मूर्ति बनाने के लिए सादा मिट्टी और चूना लिया जाता है। पानी डाल कर इन दोनों को मिक्स किया जाता है। मिक्स करने के बाद जब इनका घोल बन जाता है, तब मूर्तियों के बने हुए अलग-अलग सांचे सेट कर के इस घोल कों इनमें डाल दिया जाता है। सांचों में डालने के बाद इनको अच्छे तरीके से सांचों में फैलाया जाता है। लगभग 2 से 3 घंटे के लिए इनको सूखने के लिए छोड़ दिया जाता है। जब ये सूख जाती है। तो उनको सांचे से बाहर निकाल करके इन पर पेंट किया जाता है। पेंट करने के बाद थोड़ी देर इन को धूप में रख देते हैं। तैयार कलाकृतियों को करीने से सजा दिया जाता है।
इस भ्रमण दल में प्रो. डीएन शर्मा एवं वरिष्ठ साहित्यकार रवि श्रीवास्तव एवं विद्या गुप्ता, शानू मोहनन, स्वरूपानंद महाविद्यालय की प्राचार्य एवं इंटैक दुर्ग-भिलाई की संयोजक डॉ हंसा शुक्ला, फोटोग्राफर कांति भाई सोलंकी, डॉ प्रज्ञा सिंह, महिला महाविद्यालय की पूर्व प्राचार्य डॉ संध्या मदन मोहन, कमलेश चंद्राकर, चित्रकार डॉ महेश चतुर्वेदी, दीपक रंजन दास, डॉ अलका दास. जगमोहन सिन्हा, आदि सम्मिलित हुए।
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