एकाकी और कष्टमय हो रहा भारतीयों के जीवन का अंतिम पड़ाव

एकाकी और कष्टमय हो रहा भारतीयों के जीवन का अंतिम पड़ाव

लेखक : डॉ देवेन्द्र नाथ शर्मा
भारत में परिवार सामाजिक क्षरण के दौर से गुज़र रहे हैं l संयुक्त परिवारों का एकल परिवारों में टूटना समाज में तरह-तरह की विसंगतियों व विद्रूपताओं को जन्म दे रहा है और वृद्द्जनों के लिए सामाजिक सुरक्षा का संकट उत्पन्न कर रहा है l माता-पिता के अनुशासन और उनकी रोक-टोक से मुक्त होकर आधुनिकता के साथ अपनी मन-मर्जी के अनुसार स्वतंत्र जीवन जीने की बलवती होती इच्छाएं वर्तमान दौर की संतानों में बढ़ती जा रही है l

स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण बुजुर्गों का जीवन और अधिक कठिन और जटिल हो जाता हैं। मधुमेह, हृदय व फेफड़े सम्बंधित रोग, गठिया, घुटने का दर्द और दृष्टि-श्रवण संबंधी परेशानियाँ वृद्धावस्था में सामान्य हैं। दुर्भाग्यवश, हमारा लोक स्वास्थ्य तंत्र काफी कमजोर है और इसमें वृद्धावस्था-विशेष चिकित्सा सेवाएँ बहुत ही सीमित हैं l

इन इच्छाओं को बाज़ार खूब हवा देता है और फिर उन्हें अपने अनुरूप जीवन शैली में ढाल लेता है l रोजगार के लिए दूसरे शहरों या विदेशों में बसने से होने वाले विस्थापन से भी परिवार अवकृत हो जाता है l एक कारण यह भी है कि सामाजिक दुष्प्रभावों व संपत्ति संबंधी विवाद के कारण उपजने वाले मनमुटाव का अंत सामान्यत: परिवार को विघटन स्थिति में ला देता है l कुछ मामलों में तो एक ही घर में रहते हुए भाई-भाई में एक दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं l किसी ने सही कहा है-
पहले पड़ोसी भी परिवार था l
अब घर में ही हैं कई पड़ोसी ll
भारत में वरिष्ठ नागरिकों की संख्या लगभग 14.9 करोड़ है, अर्थात हर 10 नागरिकों में 60 वर्ष से अधिक उम्र का 1 वरिष्ठ नागरिक है l देश के वरिष्ठ नागरिकों की यह संख्या अमेरिका और फ़्रांस दोनों की जनसंख्या के योग से भी अधिक है l 2050 में भारत में बुजुर्गों की यह संख्या 32 करोड़ हो जाएगी, यानि हर 10 नागरिकों में 5 बुजुर्ग होंगे l बदलती पारिवारिक संरचना, बढ़ता शहरीकरण और व्यक्तिगत जीवन-शैली ने जब बुजुर्गों की पारंपरिक सामाजिक सुरक्षा को कमजोर कर दिया है। तब ऐसे समय में यह सवाल अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है कि क्या हमारा देश और समाज हमारे बुजुर्गों, विशेषकर कमजोर वर्गों के बुजुर्गों को उनके जीवन के अंतिम पड़ाव में गरिमामय जीवन व्यतीत करने की स्थितियां देने के लिए पर्याप्त रूप से तैयार है?
हमारे देश में अधिकतर बुजुर्गों के लिए सबसे बड़ा सवाल आर्थिक असुरक्षा का है l देश में अधिकतर व्यक्ति असंगठित क्षेत्र में कार्य करते है, जहाँ पेंशन या सेवानिवृत्ति लाभ की कोई ठोस व्यवस्था नहीं होती। असंगठित क्षेत्र में मजदूरी व नौकरी करने वाले, छोटी-मोटी सेवाएं देने या रेडी-दूकान लगाने वालों का वृद्धावस्था में आय के स्रोत समाप्त हो जाते हैं l बढ़ती महँगाई के चलते, ऐसी स्थिति में आर्थिक जरूरतों के लिए बुजुर्गों को संतान या परिजनों पर निर्भर हो जाना पड़ता है। यह निर्भरता उनके आत्मसम्मान को भी आघात पहुँचाती है। विधवा बुजुर्ग महिलाएँ इस संकट से ज्यादा गुजरती हैं।
भारत में व्यक्ति की ‘जीवन प्रत्याशा’ बढ़ कर 72-73 हो चुकी है l इस पर सरकार अपनी पीठ भी ठोकती है l लेकिन जीवन प्रत्याशा से ज्यादा महत्वपूर्ण है-‘स्वस्थ जीवन प्रत्याशा’ l आयु-जनित कठिनाइयों के बाबजूद स्वस्थ व क्रियाशील रहते हुए जीवन के समाप्त होने की औसत अवधि ‘स्वस्थ जीवन प्रत्याशा’ को दर्शाता है l एक रिपोर्ट के अनुसार देश के 65 प्रतिशत बुजुर्गों का जीवन किसी न किसी दीर्घ कालीन बीमारी, व्याधि और शारीरिक चुनौती से जूझते हुए समाप्त होता है l हालाकि, आधुनिक चिकित्सा पद्दतियों, उपचार व दवाओं के कारण इस स्थिति में भी वे अब ज्यादा वर्ष जी लेते हैं l स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ के कारण बुजुर्गों का जीवन और अधिक कठिन और जटिल हो जाता हैं। मधुमेह, हृदय व फेफड़े सम्बंधित रोग, गठिया, घुटने का दर्द और दृष्टि-श्रवण संबंधी परेशानियाँ वृद्धावस्था में सामान्य हैं। दुर्भाग्यवश, हमारा लोक स्वास्थ्य तंत्र काफी कमजोर है और इसमें ‘वृद्धावस्था-विशेष चिकित्सा सेवाएँ’ बहुत ही सीमित हैं l निजी अस्पतालों में उपचार आम बुजुर्गों की आर्थिक हैसियत से बाहर रहता है। आयुष्मान योजना के अंतर्गत वाह्य रोगी सेवाओं, बिना भर्ती हुए पैथोलॉजिकल जांच, दवाइयों व श्रवण यंत्र आदि खरीदने पर बंधन होने से तथा दूर दराज से अधिकृत अस्पताल तक आने-जाने व रहने के खर्च की व्यवस्था के न होने, परिजनों द्वारा उन्हें दूर दराज अस्पताल तक लाने-ले जाने में सहयोग न करने के कारण अधिकांश बुजुर्ग इस योजना के अंतर्गत इलाज नहीं करवा पाते हैं l बुजुर्गों के लिए मानसिक स्वास्थ्य भी एक उपेक्षित लेकिन गंभीर मुद्दा है। रोजगार या शिक्षा के लिए बच्चों का पलायन, अकेलापन और सामाजिक उपेक्षा बुजुर्गों को अवसाद की ओर धकेल रही है। कई बार वे स्वयं को परिवार पर बोझ समझने लगते हैं l
आजकल बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार और उपेक्षा की घटनाएँ भी बढ़ रहीं हैं l संपत्ति विवाद और आर्थिक शोषण जैसे मामले सामने आ रहे हैं। बुजुर्गों को बोझ मान कर उनके साथ अमानवीय व्यवहार और कभी कभी मार-पीट करने के हालात कई परिवारों में देखने को मिलते हैं l विवाद पैदा कर घर से बुजुर्गों को बेदखल कर दिया जाने लगा है l मानसिक या शारीरिक प्रताड़ना से तंग होकर कभी-कभी बुजुर्ग खुद ही घर से निकल जाते हैं और और असुरक्षित जीवन जीने को विवश होते हैं l प्रताड़ित बुजुर्गों के आत्म हत्या के मामले भी सामने आने लगे हैं l यद्यपि माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण अधिनियम प्रभावशील है, किंतु उसका प्रभावी क्रियान्वयन अभी भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। इसके अतिरिक्त, तेजी से डिजिटल होती सेवाओं ने बुजुर्गों के सामने नई समस्यायें खड़ी कर दीं हैं । बैंकिंग, पेंशन, स्वास्थ्य और सरकारी सुविधाएँ के ऑनलाइन हो जाने से तकनीक से अपरिचित बुजुर्ग कठिनाइयों से गुजरते हैं । कई बुजुर्ग साइबर ठगी के शिकार हो रहे हैं और अपनी जमा-पूंजी गँवा बैठते हैं l बड़े शहरों में कई संपन्न बुजुर्ग अपने ही नौकर से लूटे या क़त्ल किये जा चुके हैं l
वास्तव में बुजुर्ग अनुभव और मार्गदर्शन के अमूल्य स्रोत हैं। उनसे परिवार व समाज को दिशा और संतुलन मिलता है। अत: उन्हें अधिकार, सम्मान और सक्रिय भागीदारी के साथ जीवन जीने का अवसर प्रदान करने की आवश्यकता है l बुजुर्गों की साल-दर-साल बढ़ रही संख्या के परिपेक्ष्य में एक दीर्घकालीन नई राष्ट्रीय वृद्द्जन नीति बनाया जाना जरुरी हैं जो बुजुर्ग जनसँख्या की आवश्यकताओं को संबोधित कर सकें l केन्द्रीय बजट में बुजुर्गों के लिए सार्वभौमिक पेंशन, सुदृढ़, वृद्दावस्था विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवाएँ, मानसिक स्वास्थ्य समर्थन, कानूनी सुरक्षा और वृद्धजन-अनुकूल बुनियादी ढाँचा सुनिश्चित करने हेतु पर्याप्त धन -राशि का प्रावधान होना चाहिए l
#Oldage_Loneliness

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