छत्तीसगढ़ के धर्मांतरण कानून को चुनौती, सुप्रीम कोर्ट सुनवाई को राजी
नई दिल्ली। छत्तीसगढ़ के धर्मांतरण कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करने पर सहमति जताई है। ईसाई आदिवासी महासभा ने छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम, 2026 के प्रावधानों को चुनौती देते हुए कहा है कि यह कानून धार्मिक गतिविधियों पर मनमानी और पाबंदियां लगाता है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि इस कानून के तहत चर्च में रविवार को होने वाली प्रार्थना सभाओं पर भी अधिकारियों की तरफ से कार्रवाई की जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इस मामले में हाई कोर्ट के फैसले से भी मदद मिल सकती है। उन्होंने कहा कि कुछ याचिकाकर्ताओं ने हाई कोर्ट का रुख भी किया है। ऐसे में अगर सुप्रीम कोर्ट सीधे सुनवाई शुरू कर देता है, तो हाई कोर्ट में चल रही सुनवाई प्रभावित हो सकती है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अगर हाई कोर्ट तय समय में मामले पर सुनवाई कर सके, तो उसके फैसले से सुप्रीम कोर्ट को भी मदद मिलेगी।
याचिकाकर्ताओं की तरफ से पेश वकील कॉलिन ने बताया कि इस मुद्दे पर सात याचिकाएं हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि हाई कोर्ट में लंबित मामलों को भी सुप्रीम कोर्ट में लाया जा सकता है और सभी मामलों के लिए एक वकील को जिम्मेदारी दी जा सकती है। उन्होंने कहा कि वह दूसरे याचिकाकर्ताओं से बात करेंगे और वे मामले को सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित करने के लिए याचिका दाखिल कर सकते हैं। वकील ने कानून की भाषा को व्यापक बताते हुए कहा कि इसका असर दूर तक हो सकता है। मुख्य न्यायाधीश ने मामले में नोटिस जारी करने का निर्देश दिया। साथ ही रजिस्ट्री से कहा कि इसी मुद्दे पर दाखिल सभी मामलों की जानकारी जुटाई जाए।
छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम, 2026 को छत्तीसगढ़ विधानसभा ने मार्च 2026 में पारित किया था। अप्रैल में राज्यपाल की मंजूरी मिलने के बाद इसने 1968 से लागू पुराने कानून की जगह ली। इसके नियमों को भी चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि कानून अंतरात्मा की स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता, निजता और व्यक्तिगत आजादी के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। उनका आरोप है कि स्वेच्छा से धर्म बदलने के लिए भी सार्वजनिक जानकारी देने और सरकारी मंजूरी से जुड़ी कई प्रक्रियाएं पूरी करनी पड़ती हैं।
याचिका में धर्मांतरण कराने वाले पादरियों और अन्य धार्मिक अगुवों के पंजीकरण की शर्त पर भी सवाल उठाए गए हैं। कानून में कुछ अपराधों के लिए कम से कम सात साल की कैद, जिसे उम्रकैद तक बढ़ाया जा सकता है, और 10 लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि इन प्रावधानों का इस्तेमाल धार्मिक स्थलों को बंद कराने और लोगों के पूजा-पाठ व धार्मिक सभाओं के अधिकार को प्रभावित करने के लिए किया जा रहा है। इस मामले में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने 8 अक्टूबर को राज्य सरकार को तीन हफ्ते के भीतर जवाब देने के लिए नोटिस जारी किया था।
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