छोटी-छोटी बातों पर आपका गुस्से में फट पड़ना कहीं IED तो नहीं
कुछ लोग बिना किसी ठोस कारण ही गुस्से में फट पड़ते हैं। युवा पीढ़ी में यह समस्या कहीं ज्यादा दिखाई देती है। दरअसल, इस समस्या का सूत्रपात पिछली पीढ़ी में ही हो चुका था पर इसका भयानक रूप अब सामने आ रहा है। छोटी सी बात पर भयंकर गुस्सा आना, गुस्से में चीखना चिल्ला, दीवारों पर मुक्के मारना या किसी को मार देने की कोशिश करना दरअसल एक मानसिक समस्या है। सही आकलन एवं थेरेपी के द्वारा इसका इलाज संभव है। इस समस्या को IED (इंटरमिटेंट एक्स्प्लोसिव डिसऑर्डर) कहा गया है। (image source : Mental Health Hope)

IED की परेशानी वाले मरीज का अक्सर दफ्तर और घर में झगड़ा हो जाया करता है। छोटी छोटी बातों पर उनका इस तरह भड़कना या चीजों को फेंकने लगा उनके कामकाजी जीवन के साथ ही पारिवारिक जीवन को भी अच्छा खासा नुकसान पहुंचा सकता है। हालांकि ऐसे एपिसोड कुछ ही देर के होते हैं जिसके बाद व्यक्ति शांत हो जाता है और फिर ग्लानि महसूस करता है।
ऐसे मरीजों का व्यवहार आम तौर पर एकदम सामान्य रहता है। गुस्सा ट्रिगर होने का कारण कुछ भी हो सकता है – किसी का सोफे पर पैर चढ़ाकर बैठ जाना, बिना पूछे कोई सामान उठा लेना या इस्तेमाल करना, टॉयलेट का लाइट जलता हुआ छोड़ देना, गीला टावल बिस्तर पर रख देना, कारण कुछ भी हो सकता है। ऐसी कोई भी बात जो उसे नापसंद हो, उसके गुस्से को सातवें आसमान पर पहुंचा सकता है।
क्या हैं इसके कारण
इंटरमिटेंट एक्सप्लोसिव डिसऑर्डर (IED) , कभी भी किसी एक वजह से नहीं होता है।
बचपन का माहौल: बचपन में घर का ऐसा परिवेश जहां जुबानी आक्रामकता आम हो। इस वजह से व्यक्ति को अपनी भावनाओं पर ठीक से काबू करना या साझा करना आता ही नहीं।
न्यूरोबायोलॉजिकल कमजोरी: लंबे समय से नींद की समस्या। सेरोटोनिन के ठीक से काम न करने और एमिग्डाला-प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स के बीच तालमेल की कमी के चलते व्यक्ति के व्यवहार में ये एक्सट्रीम ट्रेट्स दिखाई देते हैं।
सही मार्गदर्शन और इलाज की कमी: शर्म के भाव और लक्षणों को टालने के कारण समस्या बढ़ती है। मरीज इलाज से दूर ही रहता है। हर बार आउटबर्स्ट उसके अंदर इस भाव को और प्रबल कर देता है कि कमी उसी में है और वो ही अंदर से टूटा हुआ है। इससे चिड़चिड़ापन और बढ़ जाता है।
कैसे होता है इलाज
मरीज के ट्रीटमेंट के लिए टू-ट्रैक अप्रोच अपनाया जाता है। साइकोथेरेपी प्रमुख रहती है। इसके अंतर्गत 16 सप्ताह तक कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी दी जाती है।
गुस्से के ग्राफ को समझना ताकि शुरुआती संकेतों को पकड़ा जा सके। इसके साथ ही कॉग्निटिव रीस्ट्रक्चरिंग प्रैक्टिस को उन विचारों पर फोकस कर लागू किया जाता है, जो खतरे के भाव को ट्रिगर करते हैं।
माइल्ड ट्रिगर्स को भी रेखांकित किया जाता है और उनके लिए रिस्पॉन्स प्रिवेंशन टेकनीक अपनाई जाती है। रोगी को इनपर काबू करना सिखाया जाता है।
सायकाइट्रिस्ट की मदद से कम डोज वाली SSRI दवाएं शुरू की। IED के मामलों में अचानक से आने वाले गुस्से को कम करने के लिए ये दवा सबसे कारगार मानी जाती है।
इलाज का असर
लगातार ट्रीटमेंट जारी रखने के बाद सकारात्मक असर दिखने लगते हैं। आउटबर्स्ट फ्रीक्वेंसी कम होती जाती है। अर्थात अब इसके दौरे कभी कभार पड़ते हैं। रोगी का आत्मविश्वास बढ़ता है और वह ठीक होने लगता है। हिंसक आउटबर्स्ट न के बराबर रह जाते हैं।
#Intermittent_Explosive_Disorder #Mental_Problem #Emotional_Outbursts












