देवता का भोग संकट में है. हालत पूजा पंडालों जैसी हो गई है. 56 भोग घटते-घटते खीरे के टुकड़ों पर आ टिका है. जी हां! बात कर रहे हैं सरकारी दूध कंपनी देवभोग की. अच्छा खासा धंधा चल रहा था. नगद की बिक्री थी. रेट बढ़ाने की छूट थी. बावजूद इसके धंधे में निजी के आगे टिक नहीं पाया. दूध किसानों का भुगतान रोकना कंपनी को भारी पड़ गया. अब कंपनी के पास पर्याप्त दूध नहीं है. यही आलम रहा तो जल्द ही अपनी पूंछ चबाने की नौबत आ जाएगी. दरअसल, सरकारी उपक्रमों की यही दिक्कत है. सरकारी नौकरी का मतलब केवल वेतन, भत्ता, पदोन्नति और एरियर्स होकर रह गया है. जरा सी कटौती हुई नहीं कि सड़कों पर आकर बैठ जाते हैं.












