रायपुर। मेरे जीवन की प्रेरणा मेरी मां है। बचपन में मां जब घर की सजावट, भाई की पढ़ाई के लिए पेंटिंग तैयार किया करती थी तो उस समय उसे देखकर मैं सोचती थी, मुझसे ऐसी पेंटिंग कभी नहीं बन पाएगी। लेकिन मां हमेशा कहती थी, जब करेगी तभी सीखेगी। धीरे-धीरे पेंटिंग बनाना शुरू किया, फिर पेंटिंग के प्रति मेरी रूचि को देखते हुए पिता ने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में फाइन आर्ट की पढ़ाई करने के लिए भेज दिया। आज आलम यह है कि देश-विदेश की आटर्गैलरियों में मेरी बनाई मूर्ति शिल्प सजती हैं। यह बातें महाकौशल कला वीथिका में आयोजित मूर्तिशिल्प प्रदर्शन के दौरान इंदिरा पुरकायस्थ घोष ने कही।












