बहस : रेवड़ी कल्चर से भटकी राजनीति, सुप्रीम कोर्ट की भी नजर

बहस : रेवड़ी कल्चर से भटकी राजनीति, सुप्रीम कोर्ट की भी नजर

नई दिल्ली। चुनाव जीतने के लिए लोकलुभावन वायदे करने का अब एक फैशन बन चुका है। इनमें से कुछ वायदों को पूरा करने के लिए सरकारें अपनी तिजोरियां खाली कर रही हैं। कई राज्यों की तो इसके चलते माली हालत खस्ता हो चुकी है। वहां योजनाओं के लिए पैसे नहीं बचते। निर्माण कार्यों से लेकर स्वास्थ्य सेवाओं तक के बिल कई-कई महीनों तक लटके रहते हैं। सुप्रीम कोर्ट में इसे लेकर कई याचिकाएं लंबित हैं। क्या संविधान इसकी इजाजत देता है?

सत्तासीन हो या विपक्षी दल चुनावों में अपनी जीत तय करने के लिए बड़े बड़े वादे करते हैं । ऐसे वादों का असर बाद में राज्य या केंद्र की वित्तीय स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। लेकिन इन तथ्यों को दरकिनार करते हुए देश के हर चुनावों में मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी, महिलाओं को नकद सहायता, किसानों की कर्ज माफी और युवाओं को भत्ता जैसे वादे भारतीय राजनीति का बड़ा हिस्सा बन चुके हैं।

हालिया तमिलनाडु के चुनावों में थलपति विजय की पार्टी ने जीत कर रिकार्ड ही नहीं बनाया बल्कि सत्ता भी हथिया ली। माना जा रहा है इस बड़ी जीत और उनकी सरकार बनाने में इन्हीं फ्रीबीज और लुभावने वादों की अहम भूमिका है। लेकिन अब इन ‘फ्रीबीज’ पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों ने नई बहस छेड़ दी है। सवाल उठ रहा है कि क्या वोट पाने के लिए मुफ्त योजनाओं का ऐलान संविधान की भावना के खिलाफ है? क्या कानून इसे रोकता है? और क्या हर तरह की मुफ्त योजना ‘रेवड़ी संस्कृति’ है?
थलपति विजय की जीत और फ्रीबीज
तमिलनाडु में विजय की एक नई-नवेली पार्टी ने कमाल कर दिखाया है। विजय के फ्रीबीज वाली चुनावी घोषणाओं ने उनकी जीत में बड़ा रोल निभाया है। क्या हैं ये घोषणाएं

  • 60 साल की महिलाओं को हर महीने 2500 रुपये।
    साल में 6 गैस सिलेंडर मुफ्त।
    नई दुल्हन को सोने का सिक्का और एक रेशमी साड़ी।
    बच्चे के जन्म पर सोने की अंगूठी
    छात्राओं के लिए हर साल 15 हजार रुपये।
    पीएचडी तक के छात्रों को 20 लाख का लोन।
    स्नातक बेरोजगारों को 4000 रुपये
    डिप्लोमा धारकों को 2500 रुपये मासिक भत्ता।
    महिला स्वयं सहायता समूहों को 5 लाख रुपये की वित्तीय मदद
    पांच एकड़ तक के किसानों का कर्ज माफ

सुप्रीम कोर्ट में पहले से ही कई याचिकाएं चुनावों में फ्रीबीज और रेवड़ी कल्चर को को लेकर दायर हैं। इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट की ओर से केंद्र सरकार CAG और चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया है। ऐसे चुनावी वादों के गैरकानूनी होने के मद्देनजर साल 2013 में भी शीर्ष अदालत में यह सवाल उठा था। मामला तमिलनाडु में चुनावी वादों का ही था, जहां राजनीतिक दलों ने टीवी, मिक्सर-ग्राइंडर और लैपटॉप बांटने का वादा किया था। इस पर अदालत ने अपने फैसले में कहा कि चुनावी घोषणापत्र में किए गए वादे सीधे तौर पर भ्रष्ट आचरण यानी नहीं माने जा सकते।

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि लोकतंत्र में राजनीतिक दलों को अपनी चुनावी नीतियां घोषणा पत्रों के जरिए घोषित करने का अधिकार है। लेकिन कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे वादे वित्तीय रूप से जिम्मेदार होने चाहिए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इन दिशा – निर्देशों को दरकिनार कर दिया गया। कई राज्यों में चुनावी जीत के बाद रेवड़ी कल्चर को पूरा करने में राज्यों की वित्तीय स्थिति खराब हो गई। हाल के महीनों में सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों की सुनवाई के दौरान राज्यों की मुफ्त योजनाओं पर गंभीर चिंता जताई। कोर्ट के सवाल हैं कि

  • अगर सरकारें लगातार मुफ्त राशन, बिजली और नकद सहायता देती रहेंगी, तो विकास परियोजनाओं के लिए पैसा कहां से आएगा?
    अदालत ने यह भी कहा है कि बिना जरूरतमंद और सक्षम लोगों में फर्क किए मुफ्त सुविधाएं बांटना “तुष्टिकरण” की नीति बन सकता है।
    बढ़ते रेवेन्यू घाटे के बावजूद राज्यों की ओर से मुफ्त योजनाएं चलाए जाने का क्या औचित्य है
    लोकतंत्र में राजनीतिक दलों को अपनी चुनावी नीतियां घोषणा पत्रों के जरिए घोषित करने का अधिकार है। लेकिन ऐसे वादे वित्तीय रूप से जिम्मेदार होने चाहिए।

संविधान का क्या है नजरिया
देश के संविधान में कहीं “फ्रीबीज” या रेवड़ी कल्चर का का जिक्र नहीं हैं। लेकिन सरकारें इसके लिए संविधान के ही नीति निदेशक तत्व यानी सरकारों को कल्याणकारी राज्य बनाने के निर्देशों का हवाला देते हैं।
अनुच्छेद 38 कहता है कि राज्य सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुनिश्चित करेगा।
अनुच्छेद 39 में नागरिकों के लिए आजीविका और संसाधनों के समान वितरण की बात कही गई है।
अनुच्छेद 41 बेरोजगारी, बुढ़ापे और बीमारी की स्थिति में सार्वजनिक सहायता देने की बात करता है।
अनुच्छेद 47 राज्य को पोषण और जीवन स्तर सुधारने का दायित्व देता है।
कह सकते हैं कि संविधान के जरिए केंद्र या राज्य सरकारों को गरीबों और कमजोर वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाएं चलाने की अनुमति तो देता ही है…जिम्मेदारी भी तय कर दी है। शायद यही कारण है कि मुफ्त राशन, मनरेगा, छात्रवृत्ति, मिड-डे मील, या स्वास्थ्य बीमा जैसी योजनाओं को न्यायालयी सुनवाईयों भी आम तौर पर संवैधानिक मानने की परंपरा रही है।

कल्याणकारी योजनाओं और रेवड़ी कल्चर के बीच संतुलन जरूरी
चाहे केंद्र हो या राज्य..चुनावों में महिलाओं, किसानों, युवाओं और गरीब वर्गों के लिए नकद सहायता या किसी जरिए से सब्सिडी का वादा… अब लगता है कि जनता इसकी अभ्यस्त हो चुकी है। भारत का संविधान तो सरकारों को कल्याणकारी योजनाओं की अनुमति देता ही है। संविधान सरकारों को अपनी नीतियों के जरिए सामाजिक न्याय लागू करने का दायित्व भी सौंपता है। इसलिए हर मुफ्त योजना या फ्रीबीज को असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता। ऐसे में यह कहना सही होगा कि सुप्रीम कोर्ट की सलाह यही रही है कि कल्याणकारी योजनाओं और चुनावी तुष्टिकरण के बीच संतुलन बना रहे।

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