जैसलमेर में बढ़ रही गोडावण की संख्या; 128 से 198 हुई

जैसलमेर में बढ़ रही गोडावण की संख्या; 128 से 198 हुई

राजस्थान। जैसलमेर। राजस्थान के राजकीय पक्षी गोडावण के संरक्षण की दिशा में साल 2026 एक ऐतिहासिक मोड़ सामने आया है। नवभारत टाइम्स की खबर के अनुसार भारतीय वन्यजीव संस्थान की ओर से 7 से 17 अप्रैल 2025 तक की गई राष्ट्रीय वैज्ञानिक गणना में जैसलमेर और आस-पास के करीब 22 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में कुल 198 गोडावण दर्ज किए गए हैं। 2017 की गणना में यह संख्या 128 थी।

ताजा आंकड़ों के अनुसार, जैसलमेर के खुले जंगलों, डेजर्ट नेशनल पार्क क्षेत्र और सेना की पोकरण फील्ड फायरिंग रेंज में कुल 130 गोडावण विचरण करते पाए गए। भले ही यह वृद्धि बहुत बड़ी न दिखे, लेकिन लगातार खतरों के बीच संख्या का स्थिर रहना और थोड़ा बढ़ना भी विशेषज्ञों के अनुसार बड़ी उपलब्धि है। सबसे उल्लेखनीय प्रदर्शन जैसलमेर के ब्रीडिंग सेंटर्स का रहा। रामदेवरा और सम स्थित केंद्रों में कुल 68 गोडावण दर्ज किए गए हैं। गौरतलब है कि 2017 में इन केंद्रों में गोडावणों की संख्या शून्य थी।

WII और राजस्थान वन विभाग ने संयुक्त रूप से काम किया। जंगलों से गोडावण के अंडों को सुरक्षित उठाकर नियंत्रित वातावरण में हैच कराया गया और चूजों की विशेष निगरानी में परवरिश की गई। इन पक्षियों को वैज्ञानिक देखरेख, पोषण और सुरक्षा प्रदान की गई ताकि उनकी जीवित रहने की दर अधिकतम हो सके। आज ये 68 पक्षी इस प्रजाति के लिए ‘इंश्योरेंस पॉपुलेशन’ का कार्य कर रहे हैं। यदि भविष्य में किसी प्राकृतिक या मानवजनित कारण से खुले जंगल में संख्या घटती है, तो यही पक्षी प्रजाति को पुनर्जीवित करने में आधार बनेंगे।

2025 की गणना में ‘ऑक्यूपेंसी एंड डिस्टेंस सैंपलिंग’ पद्धति अपनाई गई। इसके तहत पूरे क्षेत्र को ब्लॉक्स में विभाजित किया गया। मयजालर, सुदासरी, रामगढ़, मोहनगढ़, रासला, रामदेवरा और पोकरण जैसी सात प्रमुख रेंजों में वैज्ञानिकों ने व्यवस्थित सर्वे किया। यही कारण है कि 198 का आंकड़ा वैज्ञानिक दृष्टि से सटीक और प्रमाणिक माना जा रहा है।

GIB ब्रीडिंग सेंटर के कोऑर्डिनेटर डॉ. सुतीर्थो दत्ता के अनुसार, दुनिया के लगभग 70 प्रतिशत गोडावण जैसलमेर क्षेत्र में पाए जाते हैं। इसका अर्थ है कि इस प्रजाति का भविष्य काफी हद तक जैसलमेर के पारिस्थितिकी तंत्र पर निर्भर है। डेजर्ट नेशनल पार्क के उप वन संरक्षक बी.एम. गुप्ता ने कहा कि आठ साल बाद हुई इस विस्तृत गणना ने यह स्पष्ट किया है कि जैसलमेर का ईकोसिस्टम अब भी गोडावण के लिए अनुकूल बना हुआ है। हालांकि चुनौतियाँ बरकरार हैं, लेकिन समन्वित प्रयासों से सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं।

संख्या बढ़ने के बावजूद खतरे पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। हाई-वोल्टेज बिजली लाइनें गोडावण के लिए सबसे बड़ा संकट बनी हुई हैं। यह भारी भरकम पक्षी है और इसकी पेरिफेरल विजन सीमित होती है, जिसके कारण उड़ान के दौरान बिजली के तारों से टकराने की घटनाएँ होती रही हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद कई क्षेत्रों में अब भी तारों को अंडरग्राउंड करने की प्रक्रिया अधूरी है। इसके अलावा डेजर्ट नेशनल पार्क के आसपास आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या गोडावण के अंडों और चूजों के लिए गंभीर खतरा है। कई बार घोंसलों पर हमले की घटनाए सामने आई हैं।

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