नारी राष्ट्र की प्रगति को गति प्रदान करती है : संयुक्ता पाढ़ी
भिलाई। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर भारतीय नारी का शाश्वत सामर्थ्य विषय पर स्वामी श्री स्वरूपानंद सरस्वती महाविद्यालय में परिचर्चा आयोजित की गई। कार्यक्रम में अंग्रेजी विभाग की विभागाध्यक्ष संयुक्ता पाढ़ी ने कहा कि भारतीय नारी के सामर्थ्य को किसी एक दिन के उत्सव में सीमित करना उसके वास्तविक स्वरूप को संकुचित करने जैसा है। हर वर्ष महिला दिवस पर नारी सशक्तिकरण की चर्चा होती है, लेकिन यह प्रश्न भी उठता है कि क्या भारतीय महिलाओं को अपने सामर्थ्य को पहचानने के लिए किसी विशेष दिवस की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि भारतीय सभ्यता में नारी केवल सामाजिक भूमिका तक सीमित नहीं रही, बल्कि वह सृष्टि के संतुलन की मूलधारा रही है। जहां पाश्चात्य समाज में समानता और अधिकारों पर विमर्श बाद में दिखाई देता है, वहीं भारत की प्राचीन ज्ञान-परंपरा में नारी आरंभ से ही बौद्धिक संवाद की सहभागी रही है। वैदिक काल में गार्गी, मैत्रेयी और लोपामुद्रा जैसी विदुषियों ने न केवल शास्त्रों का अध्ययन किया, बल्कि दार्शनिक विमर्शों में ऋषियों को भी चुनौती दी।
राष्ट्रीय सेवा योजना इकाई की कार्यक्रम अधिकारी संयुक्ता ने कहा कि इतिहास में मुगल और औपनिवेशिक काल जैसे दौर भी आए, जब सामाजिक परिस्थितियों के कारण महिलाओं की स्थिति सीमित हुई। हालांकि समय के साथ समाज बदला और आज भारतीय महिलाएं प्रशासन, विज्ञान, न्यायपालिका, सेना, शिक्षा और उद्योग जैसे क्षेत्रों में आगे हैं।
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