यहां ताड़ की टपरी में लगता है स्कूल। गाँव वालों ने ही ताड़ पत्तों और बांस के डंडों से इस टपरी का निर्माण किया है। मौसम अच्छा होता है तो खुले में भी क्लास लग जाती है। यह सिलसिला पिछले 11 सालों से जारी है। कहते हैं स्कूल भवन स्वीकृत हो चुका है पर कब बनेगा कोई नहीं जानता। यहां पहुंचने के लिए शिक्षक और बच्चों को एक नदी और दो नालों को तैरकर पार करने पड़ते हैं।












