durg university2

दुर्ग। जनजातियों द्वारा की जाने वाली प्रकृति की पूजा से न केवल आदमी को अपनी लघुता का एहसास होता है अपितु हमारे अंहकार का भी हनन होता है। ये उद्गार दुर्ग विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी भारतीय संास्कृतिक धारा- अनादि से आजतक के उद्घाटन समारोह में आमंत्रित वक्ताओं ने व्यक्त किये। बीआईटी दुर्ग के सभागार में बड़ी संख्या में उपस्थित जनजातीय प्रतिनिधियों एवं प्राध्यापकों तथा शोधकर्ताओं को संबोधित करते हुये उद्घाटन समारोह के मुख्य अतिथि अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के अध्यक्ष श्री जगदेवराम उरांव ने कहा की आदिवासी समाज एवं जनजातियों की अपनी विशिष्ट संस्कृति है।

दुर्ग। जनजातियों द्वारा की जाने वाली प्रकृति की पूजा से न केवल आदमी को अपनी लघुता का एहसास होता है अपितु हमारे अंहकार का भी हनन होता है। ये उद्गार दुर्ग विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी भारतीय संास्कृतिक धारा- अनादि से आजतक के उद्घाटन समारोह में आमंत्रित वक्ताओं ने व्यक्त किये। बीआईटी दुर्ग के सभागार में बड़ी संख्या में उपस्थित जनजातीय प्रतिनिधियों एवं प्राध्यापकों तथा शोधकर्ताओं को संबोधित करते हुये उद्घाटन समारोह के मुख्य अतिथि अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के अध्यक्ष श्री जगदेवराम उरांव ने कहा की आदिवासी समाज एवं जनजातियों की अपनी विशिष्ट संस्कृति है।

Full size460 × 300

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *